श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 20: पूरु का वंश  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  9.20.36 
अन्तर्वत्‍न्यां भ्रातृपत्‍न्यां मैथुनाय बृहस्पति: ।
प्रवृत्तो वारितो गर्भं शप्‍त्वा वीर्यमुपासृजत् ॥ ३६ ॥
 
 
अनुवाद
बृहस्पति देव ने अपने भाई की पत्नी ममता पर मोहित होने पर उसके गर्भवती होते हुए भी उसके साथ संभोग करना चाहा। उसके गर्भ के भीतर के पुत्र ने मना किया लेकिन बृहस्पति ने उसे शाप दे दिया और बलात् ममता के गर्भ में वीर्य स्थापित कर दिया।
 
Brihaspati Dev was attracted to his brother's wife Mamta and wanted to have sex with her even though she was pregnant. The son inside her womb refused but Brihaspati cursed him and forcibly placed his semen in Mamta's womb.
तात्पर्य
इस भौतिक संसार में, काम प्रेरणा इतनी प्रबल होती है कि बृहस्पति, जिन्हें देवताओं के पुरोहित और एक महान विद्वान माना जाता है, वे अपने भाई की गर्भवती पत्नी से यौन संबंध बनाना चाहते थे। यह उच्च देवताओं के समाज में भी हो सकता है, तो मानव समाज की बात क्या है? काम प्रेरणा इतनी प्रबल होती है कि यह बृहस्पति जैसे विद्वान व्यक्ति को भी विक्षुब्ध कर सकती है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)