श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 20: पूरु का वंश  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  9.20.22 
रेतोधा: पुत्रो नयति नरदेव यमक्षयात् ।
त्वं चास्य धाता गर्भस्य सत्यमाह शकुन्तला ॥ २२ ॥
 
 
अनुवाद
हे राजा दुष्मन्त, वह जो अपने वीर्य को स्थापित करता है, वास्तविक पिता है, और उसका पुत्र उसे यमराज के चंगुल से बचाता है। आप इस बालक के असली जनक हैं। निस्संदेह शकुन्तला सच कह रही है।
 
O King Dushmanta, the one who establishes the semen is the real father and his son rescues him from the clutches of Yamaraja. You are the real creator (birth giver) of this child. Shakuntala is undoubtedly speaking the truth.
तात्पर्य
राजा दुष्यंत ने शकुन सुनकर अपनी पत्नी और पुत्र को स्वीकार कर लिया। वैदिक स्मृति के अनुसार:

पुन नाम नरकाद यस्मात पितरं त्रायते सुतः

तस्मात् पुत्र इति प्रोक्तः स्वयं एव स्वयम्भुवा

क्योंकि पुत्र अपने पिता को नरक नामक दंड से मुक्ति दिलाता है, इसलिए पुत्र को पुत्र कहा जाता है। इस सिद्धांत के अनुसार, पिता और माता के बीच विवाद होने पर पुत्र केवल पिता की ही मुक्ति दिलाता है, माता की नहीं। लेकिन यदि पत्नी अपने पति के प्रति वफादार और समर्पित हो, तो पिता की मुक्ति के साथ ही माता की भी मुक्ति हो जाती है। इसलिए, वैदिक साहित्य में तलाक जैसी कोई चीज नहीं है। एक पत्नी को हमेशा अपने पति के प्रति पवित्र और वफादार रहने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है, क्योंकि इससे उसे किसी भी घृणित भौतिक स्थिति से मुक्ति पाने में मदद मिलती है। इस श्लोक में स्पष्ट रूप से कहा गया है, पुत्रो नयति नरदेव यम-क्षयात्: "पुत्र अपने पिता को यमराज की कैद से बचाता है।" यह कभी नहीं कहता, पुत्रो नयति माताम: "पुत्र अपनी माता को बचाता है।" बीज देने वाला पिता मुक्त होता है, भंडारणी माता नहीं। इसलिए, पति और पत्नी को किसी भी परिस्थिति में अलग नहीं होना चाहिए, क्योंकि यदि उनका एक बच्चा है जिसे वे वैष्णव बनने के लिए पालते-पोसते हैं, तो वह पिता और माता दोनों को यमराज की कैद और नारकीय जीवन की सज़ा से बचा सकता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)