श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 20: पूरु का वंश  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  9.20.1 
श्रीबादरायणिरुवाच
पूरोर्वंशं प्रवक्ष्यामि यत्र जातोऽसि भारत ।
यत्र राजर्षयो वंश्या ब्रह्मवंश्याश्च जज्ञिरे ॥ १ ॥
 
 
अनुवाद
श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे महाराज भरत के वंशज एवं महाराज परीक्षित, अब मैं उस पूरु वंश का वर्णन करूँगा जिसमें आपका जन्म हुआ है, जिसमें अनेक राजर्षि हुए हैं, जिनसे अनेक ब्राह्मण वंश शुरू हुए हैं।
 
Sukadeva Goswami said: O Maharaja Pariksit, descendant of Maharaja Bharata, I will now describe the lineage of Puru in which you were born, in which many Rajarshis have been born, from whom many Brahmin dynasties have originated.
तात्पर्य
ऐसे कई ऐतिहासिक उदाहरण हैं जिनसे हम समझ सकते हैं कि क्षत्रियों से कई ब्राह्मण जन्मे हैं और ब्राह्मणों से कई क्षत्रिय पैदा हुए हैं। भगवान स्वयं भगवद्-गीता (4.13) में कहते हैं, चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुण-कर्म-विभागाशः: "भौतिक प्रकृति के तीनों गुणों और उसके द्वारा सौंपे गए कार्यों के अनुसार, मानव समाज के चार विभाग मेरे द्वारा बनाए गए थे।" इसलिए, जिस परिवार में कोई जन्म लेता है, इसकी परवाह किए बिना, जब वह किसी विशेष वर्ग के लक्षणों से युक्त होता है, तो उसका वर्णन तदनुसार किया जाना चाहिए। यल-लक्षणं प्रोक्तम्। समाज के वर्ण विभागों में किसी का स्थान उसके लक्षणों या गुणों के अनुसार निर्धारित होता है। यह शास्त्र में हर जगह कायम है। जन्म एक गौण विचार है; पहला विचार उनके गुण और गतिविधियाँ हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)