यस्य यल लक्ष्णं प्रोक्तं
पुंसो वर्णाभिव्यञ्जकं
यद् अन्यत्रापि दृश्यते
तत् तेनैव विनिर्दिशेत
यदि एक समूह के गुण दूसरे समूह के पुरुषों में पाए जाते हैं, तो उन पुरुषों को उनके गुणों से, उनके लक्षणों से पहचाना जाना चाहिए, न कि उस कुल की जाति से जिसमें उनका जन्म हुआ था। जन्म बिल्कुल भी महत्वपूर्ण नहीं है; यह किसी के गुण हैं जिन पर सभी वैदिक साहित्य में जोर दिया गया है।
