"जन्म कर्म च मे दिव्यं
एवं यो वेत्ति तत्त्वतःः
त्यक्त्वा देहं पुनर् जन्म
नैति मामेति सोऽर्जुन।।"
"हे अर्जुन, जो मेरे अवतरण और गतिविधियों के पारलौकिक स्वरूप को जानता है, वह शरीर छोड़ने पर फिर से इस भौतिक जगत में जन्म नहीं लेता, बल्कि मेरे शाश्वत निवास को प्राप्त हो जाता है" प्रषद्र, अपने कर्मो (कृत्यों) के कारण अपने अगले जन्म में एक शूद्र के रूप में जन्म लेने के लिए अभिशप्त किया गया था, परन्तु जैसे ही उन्होंने संत का जीवन अपना लिया, विशेष रूप से भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व पर हमेशा अपने मन को केंद्रित कर के, वह एक शुद्ध भक्त बन गए। आग में अपने शरीर को त्यागने के तुरंत बाद, वह भगवद गीता (मामेति) में वर्णित अनुसार अपने भक्तिपूर्ण स्थिति के परिणामस्वरूप आध्यात्मिक दुनिया में पहुँच गए। भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व के बारे में सोचकर की गई भक्ति सेवा इतनी शक्तिशाली है कि यद्यपि प्रषद्र को अभिशप्त किया गया था, वह एक शूद्र बनने के भयानक परिणाम से बच गए और इसके बजाय अपने घर, भगवान के पास लौट आये। जैसा कि ब्रम्हसंहिता (5.54) में बताया गया है :
"यस त्विन्द्रगोपमथवेंद्रमहो स्वकर्म
बंधानुरूपफलभाजनमातनोति
कर्मणी निर्दहति किन्तु च भक्तिभाँजां
गोविंदमादि पुरुषं तमहम भजामि।"
जो भक्ति सेवा में संलग्न हैं, वे अपनी भौतिक गतिविधियों के परिणामों से अप्रभावित रहते हैं। अन्यथा, हर कोई, सबसे छोटे सूक्ष्मजीव से लेकर स्वर्ग के राजा इंद्र तक, कर्म के नियमों के अधीन हैं। एक शुद्ध भक्त, भगवान की सेवा में हमेशा लगे रहने के कारण, इन नियमों से मुक्त हैं।
