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श्लोक 9.2.14  |
एवं वृत्तो वनं गत्वा दृष्ट्वा दावाग्निमुत्थितम् ।
तेनोपयुक्तकरणो ब्रह्म प्राप परं मुनि: ॥ १४ ॥ |
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| अनुवाद |
| इस मानसिकता से पृषध्र एक महान संत बन गया, और जब वो जंगल में गया और उसने जंगल की प्रचंड आग को जलते देखा तो उसने इस अवसर का लाभ उठाया और अपने शरीर को उस आग में भस्म कर दिया। इस प्रकार उसे श्रेष्ठ आध्यात्मिक जगत की प्राप्ति हो गई। |
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| इस मानसिकता से पृषध्र एक महान संत बन गया, और जब वो जंगल में गया और उसने जंगल की प्रचंड आग को जलते देखा तो उसने इस अवसर का लाभ उठाया और अपने शरीर को उस आग में भस्म कर दिया। इस प्रकार उसे श्रेष्ठ आध्यात्मिक जगत की प्राप्ति हो गई। |
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