तपो दिव्यं पुत्रका येन सत्त्वं
शुद्ध्येद यस्माद् ब्रह्म-सौख्यं त्व अनन्तं
मानव जीवन शरीर में आध्यात्मिक आत्मा (देहिनोऽस म यथा देहे) के आत्म-साक्षात्कार के लिए है। एक भौतिकवादी बदमाश यह नहीं जानता कि वह शरीर नहीं है बल्कि शरीर के भीतर एक आध्यात्मिक आत्मा है। हालाँकि, किसी को भी उसकी वास्तविक स्थिति को समझना चाहिए और ज्ञान प्राप्त करना चाहिए जिससे शारीरिक उलझन से मुक्त हो सके। उस दुर्भाग्यपूर्ण व्यक्ति की तरह जो पागलों की तरह काम करता है, भूत-प्रेतों द्वारा प्रेतवाधित, वासना के भूत द्वारा प्रेतवाधित भौतिकवादी अपने वास्तविक व्यवसाय को भूल जाता है ताकि वह जीवन की शारीरिक अवधारणा में तथाकथित खुशी का आनंद ले सके।
