श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 19: राजा ययाति को मुक्ति-लाभ  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  9.19.17 
मात्रा स्वस्रा दुहित्रा वा नाविविक्तासनो भवेत् ।
बलवानिन्द्रियग्रामो विद्वांसमपि कर्षति ॥ १७ ॥
 
 
अनुवाद
मनुष्य को अपनी माँ, बहन या बेटी के साथ एक ही सीट पर नहीं बैठना चाहिए क्योंकि इन्द्रियाँ इतनी प्रबल होती हैं कि ज्ञान में बहुत उन्नत होने पर भी व्यक्ति यौन भावनाओं से आकर्षित हो सकता है।
 
A man should not sit on the same seat with his mother, sister or daughter because the senses are so strong that even the greatest scholar can be attracted by sex.
तात्पर्य
महिलाओं के साथ व्यवहार करने का शिष्टाचार सीखने से यौन आकर्षण से मुक्ति नहीं मिलती। जैसा कि यहाँ विशेष रूप से उल्लेख किया गया है, यह आकर्षण माँ, बहन या बेटी के साथ भी संभव है। आम तौर पर, निश्चित रूप से, एक व्यक्ति अपनी माँ, बहन या बेटी के प्रति यौन रूप से आकर्षित नहीं होता है, लेकिन अगर कोई खुद को ऐसी महिला के बहुत करीब बैठने की अनुमति देता है, तो वह आकर्षित हो सकता है। यह एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है। यह कहा जा सकता है कि यदि वह सभ्य जीवन में बहुत उन्नत नहीं है तो उसके आकर्षित होने की संभावना है; हालाँकि, जैसा कि यहाँ विशेष रूप से उल्लेख किया गया है, विद्वांसम अपि कर्षति: भले ही कोई भौतिक या आध्यात्मिक रूप से अत्यधिक उन्नत हो, वह कामुक इच्छाओं से आकर्षित हो सकता है। आकर्षण का उद्देश्य माँ, बहन या बेटी भी हो सकता है। इसलिए महिलाओं के साथ व्यवहार में बेहद सावधानी बरतनी चाहिए। श्री चैतन्य महाप्रभु ऐसे व्यवहार में सबसे सख्त थे, खासकर उनके द्वारा संन्यास आदेश स्वीकार करने के बाद। वास्तव में, कोई भी महिला उन्हें सम्मान देने के लिए उनके पास नहीं आ सकती थी। फिर से, यहाँ चेतावनी दी गई है कि व्यक्ति को महिलाओं के साथ व्यवहार करने में अत्यधिक सावधानी बरतनी चाहिए। एक ब्रह्मचारी को अपने आध्यात्मिक गुरु की पत्नी को भी देखने से मना किया जाता है यदि वह युवा हो। आध्यात्मिक गुरु की पत्नी कभी-कभी अपने पति के शिष्य से कुछ सेवा ले सकती है, जैसे वह एक बेटे से लेती है, लेकिन अगर आध्यात्मिक गुरु की पत्नी युवा है, तो एक ब्रह्मचारी को उसकी सेवा करने से मना किया जाता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)