श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 19: राजा ययाति को मुक्ति-लाभ  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  9.19.14 
न जातु काम: कामानामुपभोगेन शाम्यति ।
हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते ॥ १४ ॥
 
 
अनुवाद
जैसे आग में घी डालने से आग शांत नहीं होती बल्कि और अधिक बढ़ती जाती है, उसी प्रकार निरंतर भोग द्वारा कामवासना को रोकने का प्रयास कभी भी सफल नहीं हो सकता। (वास्तव में, मनुष्य को स्वेच्छा से भौतिक इच्छाओं का त्याग करना चाहिए।)
 
Just as pouring ghee in a fire does not extinguish it but increases it more and more, similarly, the attempt to curb sexual desires through constant enjoyment can never be successful. (The fact is that a person should voluntarily end physical desires.)
तात्पर्य
एक के पास पर्याप्त पैसा और इंद्रियों को संतुष्ट करने हेतु पर्याप्त संसाधन हो सकते हैं परंतु वह तब भी संतुष्ट नहीं हो पाता है, क्योंकि रसपूर्ण इच्छाओं को भोगकर उन्हें रोकने के प्रयास कभी सफल नहीं हो सकते। यहाँ दिया गया उदाहरण बहुत ही उचित है। मक्खन से एक प्रज्जवलित आग को बुझा कर उसे नहीं रोका जा सकता।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)