श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 19: राजा ययाति को मुक्ति-लाभ  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  9.19.11 
सम्बद्धवृषण: सोऽपि ह्यजया कूपलब्धया ।
कालं बहुतिथं भद्रे कामैर्नाद्यापि तुष्यति ॥ ११ ॥
 
 
अनुवाद
हे प्रिये, जब बकरे के अण्डकोष जुड़ गये तो उसने कुएँ से मिली बकरी के साथ सम्भोग किया और यद्यपि वह अनेकानेक वर्षों तक भोग करता रहा, किन्तु आज भी वह पूरी तरह सन्तुष्ट नहीं हो पाया है।
 
O beloved, when the goat's testicles were joined, he had sexual intercourse with the goat he found at the well and although he continued to enjoy it for many years, even today he has not been completely satisfied.
तात्पर्य
जब कोई अपनी पत्नी के प्रति स्नेह से बंधा होता है, तब वह कामवासना से जुड़ जाता है, जिसे पार करना बहुत मुश्किल होता है। इसलिए, वैदिक सभ्यता के अनुसार, व्यक्ति को स्वेच्छा से अपने तथाकथित घर को त्यागकर वन में जाना चाहिए। पंचाशोर्ध्वं वनं व्रजेत्। मानव जीवन ऐसे तपस्या या तप के लिए है। भक्तों की संगति में घर पर यौन जीवन को स्वेच्छा से रोकने और अध्यात्मिक गतिविधियों में संलग्न होने के लिए जंगल जाने की तपस्या से, व्यक्ति मानव जीवन का वास्तविक उद्देश्य प्राप्त करता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)