श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 18: राजा ययाति को यौवन की पुन:प्राप्ति  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  9.18.32 
राजपुत्र्यार्थितोऽपत्ये धर्मं चावेक्ष्य धर्मवित् ।
स्मरञ्छुक्रवच: काले दिष्टमेवाभ्यपद्यत ॥ ३२ ॥
 
 
अनुवाद
जब राजकुमारी शर्मिष्ठा ने राजा ययाति से पुत्र के लिए प्रार्थना की, तो धर्म में निष्णात राजा ने उनकी इच्छा पूर्ण करने के लिए स्वीकृति दे दी। यद्यपि उन्हें शुक्राचार्य की चेतावनी याद थी, उन्होंने इस मिलन को परमेश्वर की इच्छा मानते हुए शर्मिष्ठा के साथ संभोग किया।
 
When Princess Sharmishtha begged King Yayati for a son, the king, aware of his Dharma, agreed to fulfill her wish. Although he remembered Shukracharya's warning, he considered this union to be God's will and had intercourse with Sharmishtha.
तात्पर्य
राजा ययाति क्षत्रियों के कर्तव्य के बारे में पूर्ण रूप से जानते थे। जब एक क्षत्रिय के सामने एक महिला आती है, तो वह उसकी बात को नज़रअंदाज नहीं कर सकता। यह एक धार्मिक सिद्धांत है। परिणामस्वरूप, जब धर्मराज, युधिष्ठिर ने अर्जुन को द्वारका से लौटने के बाद दुखी होते देखा, तो उसने पूछा कि क्या अर्जुन ने एक महिला को मना कर दिया है, जो उससे पुत्र की भीख मांग रही थी। हालांकि महाराज ययाति शुक्राचार्य की चेतावनी को याद रख रहे थे, फिर भी वह शर्मिष्ठा को अस्वीकार नहीं कर सके। उन्होंने उसे एक पुत्र देने को बुद्धिमानी समझा और इस प्रकार मासिक धर्म के बाद उन्होंने उसके साथ सहवास किया। इस तरह की कामवासना धार्मिक सिद्धांतों के विरुद्ध नहीं है। जैसा कि भगवद् गीता(7.11) में कहा गया है, धर्माविरुद्धो भूमतेषु कामोस्मि : कृष्ण द्वारा अनुमोदित कामोत्तेजना धार्मिक सिद्धांतों के विपरीत नहीं है। क्योंकि शर्मिष्ठा, एक राजा की पुत्री ने, ययाति से पुत्र की भीख मांगी थी, उनका मिलन कामवासना नहीं बल्कि एक धार्मिक कार्य था।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)