श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 18: राजा ययाति को यौवन की पुन:प्राप्ति  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  9.18.16 
आत्मवृत्तमविज्ञाय कत्थसे बहु भिक्षुकि ।
किं न प्रतीक्षसेऽस्माकं गृहान् बलिभुजो यथा ॥ १६ ॥
 
 
अनुवाद
अरे भिखारी, जब तू अपनी औकात नहीं समझता तो यूँ ही क्यों इतनी बकवास करता है? क्या तुम लोग अपना गुजारा हम पर निर्भर करके कौओं की तरह हमारे घर पर इंतजार नहीं करते हो?
 
Hey beggar woman, when you do not know your situation then why are you talking so much for no reason? Don't you people depend on us for your livelihood and wait at our house like crows?
तात्पर्य
कौओं का कोई स्वतंत्र जीवन नहीं होता; ये लोग भोजन के बचे हुए अवशेषों पर पूरी तरह से निर्भर रहते हैं जो घर के लोग कूड़ेदान में फेंक देते हैं। इसलिए, क्योंकि एक ब्राह्मण अपने शिष्यों पर निर्भर करता है, जब दयावती द्वारा शर्मिष्ठा की जोर-शोर से निंदा की गई थी, तो उसने दयावती पर कौए जैसी भिखारियों के परिवार से संबंध रखने का आरोप लगाया। महिलाओं का स्वभाव है कि वे थोड़ी सी भी उकसाव पर मौखिक रूप से लड़ती हैं। जैसा कि हम इस घटना से देखते हैं, यह एक लंबे, लंबे समय से उनकी प्रकृति रही है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)