एवं क्षिपन्तीं शर्मिष्ठा गुरुपुत्रीमभाषत ।
रुषा श्वसन्त्युरङ्गीव धर्षिता दष्टदच्छदा ॥ १५ ॥
अनुवाद
शुकदेव गोस्वामी ने कहा: जब शर्मिष्ठा को इस तरह कठोर शब्दों से फटकारा गया तो वह बहुत क्रोधित हो गई। एक सर्प की तरह जोर-जोर से सांस छोड़ती और अपने निचले होंठ को अपने दाँतों से चबाती हुई वह शुक्राचार्य की पुत्री से इस तरह बोली।
Sukadeva Goswami said: When Śarmiṣṭhā was rebuked in such harsh words, she became extremely angry. Breathing deeply like a serpent and biting her lower lip with her teeth, she spoke to the daughter of Śukrācārya in this manner.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥