ज्येष्ठं मन्त्रदृशं चक्रुस्त्वामन्वञ्चो वयं स्म हि ।
विश्वामित्र: सुतानाह वीरवन्तो भविष्यथ ।
ये मानं मेऽनुगृह्णन्तो वीरवन्तमकर्त माम् ॥ ३५ ॥
अनुवाद
इस प्रकार, युवा मधुच्छान्दाओं ने शुनःशेफ को अपना बड़ा भाई मान लिया और उससे कहा, "हम आपके निर्देशों का पालन करेंगे।" तब विश्वामित्र ने अपने आज्ञाकारी पुत्रों से कहा, "क्योंकि तुम लोगों ने शुनःशेफ को अपना बड़ा भाई मान लिया है, इसलिए मैं बहुत संतुष्ट हूँ। मेरा आदेश स्वीकार करके तुम लोगों ने मुझे योग्य पुत्रों का पिता बनाया है, इसलिए मैं तुम सबको पुत्रों का पिता बनने का आशीर्वाद देता हूँ।"
In this way the younger Madhuchhandas accepted Shunahshefa as their elder brother and said to him, “We will follow your orders.” Then Vishwamitra said to these obedient sons of his, “Since you have accepted Shunahshefa as your elder brother, I am satisfied. By accepting my order, you have made me the father of worthy sons, so I bless all of you that you too become the father of sons.”
तात्पर्य
सौ पुत्रों में से आधे विश्वामित्र की उस आज्ञा का उल्लंघन कर दिया, जिसके अंतर्गत उन्हें शुनःशेफ को अपने सबसे बड़े भाई के रूप में स्वीकार करना था, पर बाकि आधे पुत्रों ने उसके आदेश को स्वीकार किया। इसलिए पिता ने आज्ञाकारी पुत्रों को पुत्रों के पिता बनने का आशीर्वाद दिया। नहीं तो उन्हें भी पुत्रहीन म्लेच्छ होने का श्राप दिया गया होता।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)