पुरुरवा द्वारा अरणियों के रगड़ने से अग्नि की उत्पत्ति हुई। ऐसी अग्नि से मनुष्य को भौतिक भोगों में पूर्ण सफलता मिल सकती है। सन्तान की उत्पत्ति, दीक्षा और यज्ञ के समय भी मनुष्य अग्नि से शुद्ध हो सकता है। अ, उ, म् अक्षरों के संयुक्त उच्चारण से अग्नि को आह्वान किया जा सकता है। इसलिए उस अग्नि को राजा पुरुरवा का पुत्र माना गया।
Agni was produced by Pururva rubbing the forest fire. With such a fire, a man can get complete success in material enjoyment and he can be purified while begetting children, initiation and performing yajnas which can be invoked by the words A, U, M (Om). Thus that fire was considered the son of King Pururva.
तात्पर्य
वैदिक प्रक्रिया के अनुसार, वीर्य (शुक्र) से पुत्र प्राप्त हो सकता है, दीक्षा (सावित्र) से उत्तम शिष्य प्राप्त हो सकता है, या यज्ञ की अग्नि से पुत्र या शिष्य प्राप्त हो सकता है। इस प्रकार जब महाराज पुरूरवा ने अरणियों को रगड़कर अग्नि उत्पन्न की, तो अग्नि उनका पुत्र बन गया। वीर्य, दीक्षा या यज्ञ से कोई भी पुत्र प्राप्त कर सकता है। वैदिक मंत्र ओंकार, या प्रणव, जिसमें अक्षर अ-उ-म होते हैं, इन तीनों विधियों में से प्रत्येक को अस्तित्व में ला सकते हैं। इसलिए शब्द निर्माणनाज् जातः इंगित करते हैं कि अरणियों को रगड़ने से एक पुत्र का जन्म हुआ।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥