जब पुरुरवा के हृदय में धार्मिक अनुष्ठानों द्वारा यज्ञ करने की विधि उद्घाटित हुई तो वह उसी स्थान पर गया था जहाँ उसने अग्निस्थाली को छोड़ दिया था। वहाँ उसने देखा कि शमी वृक्ष के एक भाग से अश्वत्थ का वृक्ष उग आया है। इस वृक्ष से उसने लकड़ी का एक टुकड़ा लिए तथा उससे दो अरणियाँ बना ली। उर्वशी के लोक जाने की इच्छा में, उसने निचली अरणी को उर्वशी, ऊपरी अरणी को स्वयं तथा बीच के काष्ठ को अपने पुत्र की कल्पना से ध्यान करते हुए मंत्रोच्चारण आरंभ किया। इस प्रकार से उसने अग्नि का प्रज्ज्वलन करना शुरू कर दिया।
When the ritualistic sacrifice was revealed in Pururava's heart, he went to the same place where he had left the Agnyasthali. There he saw that an Ashwattha tree had grown from within the Shami tree. He took a piece of wood from that tree and made two aranis from it. With the desire to go to the world where Urvashi lives, he chanted mantras while meditating on Urvashi in the lower arani, himself in the upper arani and his son in the middle wood. In this way he began to light the fire.
तात्पर्य
यज्ञ में प्रज्ज्वलित की जाने वाली वैदिक अग्नि साधारण माचिस या अन्य उपकरणों से नहीं जलायी जाती थी। बल्कि, वैदिक अनुष्ठानिक अग्नि अरणियों द्वारा जलायी जाती थी, जो कि लकड़ी के दो पवित्र टुकड़े होते हैं, जो एक-दूसरे से घर्षण द्वारा अग्नि उत्पन्न करते हैं। यज्ञ अनुष्ठान में इस प्रकार की अग्नि आवश्यक होती है। यदि यह सफल रहा, तो यज्ञ अनुष्ठान करने वाले की इच्छा पूर्ण होगी। इस प्रकार, पुरुरवा ने अपनी कामुक इच्छाओं को पूरा करने के लिए यज्ञ अनुष्ठान के द्वारा लाभ उठाया। उन्होंने निचली अरणि को उर्वशी के रूप में सोचा, उपरी अरणि को स्वयं के रूप में सोचा और मध्य अरणि को अपने पुत्र के रूप में सोचा। इस संदर्भ में विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने एक प्रासंगिक वैदिक मंत्र उद्घृत किया है, "शमी-गर्भाद् अग्निं मन्थ।" एक समान मंत्र है, "उर्वश्याम उरसि पुरुरवाः।" पुरुरवा लगातार उर्वशी के गर्भ से संतान उत्पन्न करना चाहते थे। उनकी मात्र एक ही इच्छा थी, उर्वशी के साथ संभोग करना और उसके द्वारा एक पुत्र प्राप्त करना। दूसरे शब्दों में, उनके हृदय में इतनी कामना थी कि यज्ञ करते समय भी उन्होंने यज्ञेश्वर, भगवान विष्णु के विषय में सोचने के बजाय उर्वशी के विषय में सोचा।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥