श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 14: पुरुरवा का उर्वशी पर मोहित होना  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  9.14.43 
स्थालीं न्यस्य वने गत्वा गृहानाध्यायतो निशि ।
त्रेतायां सम्प्रवृत्तायां मनसि त्रय्यवर्तत ॥ ४३ ॥
 
 
अनुवाद
तब राजा पुरुरवा ने अग्निस्थाली को जंगल में छोड़कर वापिस अपने घर आ गए जहाँ उन्होंने सारी रात उर्वशी का ध्यान किया। उसी समय में त्रेतायुग का प्रारंभ हो गया था और साथ ही फलदायी कर्मकांडों की पूर्ति के लिए यज्ञ करने की विधियों सहित वेदत्रयी के सभी सिद्धांत उनके हृदय में प्रकट हुए।
 
Then King Pururava left Agnishthali in the forest and returned home where he meditated on Urvashi all night. During his meditation, the Treta Yuga began; thus all the principles of the three Vedas, including the methods of performing sacrifices for the fulfillment of karma, appeared within his heart.
तात्पर्य
यह कहा जाता है, त्रेतायां यजतो मखैः: त्रेता-युग में, यदि कोई यज्ञ करता था, तो उसे उन यज्ञों का परिणाम मिलता था। विशेष रूप से विष्णु-यज्ञ करने से, व्यक्ति भगवान के चरणों को भी प्राप्त कर सकता था। बेशक, यज्ञ का उद्देश्य भगवान को प्रसन्न करना है। जब पुरूरवा उर्वशी पर ध्यान कर रहा था, त्रेता-युग शुरू हुआ, और इसलिए वैदिक यज्ञ उसके हृदय में प्रकट हुए। लेकिन पुरूरवा एक भौतिकवादी व्यक्ति था, जो विशेष रूप से इंद्रियों का आनंद लेने में रुचि रखता था। इंद्रियों के भोग के लिए यज्ञों को कर्म-कांडीय-यज्ञ कहा जाता है। इसलिए, उसने अपनी वासनाओं को पूरा करने के लिए कर्म-कांडीय-यज्ञ करने का निश्चय किया। दूसरे शब्दों में, कर्म-कांडीय-यज्ञ कामुक व्यक्तियों के लिए होते हैं, जबकि यज्ञ वास्तव में भगवान को प्रसन्न करने के लिए किए जाने चाहिए। कलियुग में भगवान को प्रसन्न करने के लिए, संकीर्तन-यज्ञ की सिफारिश की जाती है। यज्ञैः संकीर्तन-प्रायैर् यजन्ति हि सुमेधसः। केवल वे ही जो बहुत बुद्धिमान होते हैं, सभी इच्छाओं, भौतिक और आध्यात्मिक को पूरा करने के लिए संकीर्तन-यज्ञ करते हैं, जबकि जो लोग इंद्रियों के भोग के लिए वासना करते हैं, वे कर्म-कांडीय-यज्ञ करते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)