माता यस्य गृहे नास्ति
भार्या चाप्रिय-वादनी
अरण्यं तेना गन्तव्यं
यथारण्यं तथा गृहम्
(चाणक्य-श्लोक 57)
कृष्णभावनापूर्ण गृहस्थों को धूर्त लोमड़ी महिला से बहुत सावधान रहना चाहिए। यदि घर की पत्नी आज्ञाकारी है और कृष्ण चेतना में उसके पति का अनुसरण करती है, तो घर स्वागत योग्य है। अन्यथा व्यक्ति को अपना घर छोड़कर जंगल चले जाना चाहिए।
हित्वात्म-पातं गृहम् अन्ध-कूपम्
वनं गतो यद् धरिम आश्रयेत
(भागवत 7.5.5)
व्यक्ति को वन में जाना चाहिए और भगवान के चरण कमलों की शरण लेनी चाहिए, जो कि भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व है।
