श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 14: पुरुरवा का उर्वशी पर मोहित होना  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  9.14.36 
उर्वश्युवाच
मा मृथा: पुरुषोऽसि त्वं मा स्म त्वाद्युर्वृका इमे ।
क्‍वापि सख्यं न वै स्त्रीणां वृकाणां हृदयं यथा ॥ ३६ ॥
 
 
अनुवाद
उर्वशी ने कहा: हे राजन, तुम पुरुष हो, वीर हो। उतावलेपन में अपना जीवन मत त्याग दो। संयमित रहो और लोमड़ी की तरह अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण मत खो दो। तुम उनकी भेंट मत बनो। दूसरे शब्दों में, तुम्हें अपनी इंद्रियों के अधीन नहीं होना चाहिए। बल्कि, तुम्हें स्त्री के दिल को लोमड़ी की तरह समझना चाहिए। स्त्रियों से मित्रता करने का कोई फ़ायदा नहीं है।
 
Urvashi said: O King, you are a man, a brave man. Do not be impatient and do not sacrifice your life. Be serious and do not be controlled by your senses like foxes. Do not become food for foxes. In other words, you should not be controlled by your senses. Rather you should know the heart of a woman like a fox. There is no benefit in making friendship with women.
तात्पर्य
चाणक्य पंडितने सलाह दी है, विश्वासो नैव कर्तव्यः स्त्रीषु राज-कुलषु च: "एक महिला या राजनेता पर कभी विश्वास मत करें।" आध्यात्मिक चेतना से ऊपर उठने तक, हर कोई वातानुकूलित और पतित है, जो महिलाओं की बात करें, जो पुरुषों से कम बुद्धिमान हैं। महिलाओं की तुलना शूद्रों और वैश्यों से की गई है (स्त्रियो वैश्या तथा शूद्र)। हालाँकि, आध्यात्मिक धरातल पर, जब कोई कृष्ण चेतना के मंच पर पहुँच जाता है, चाहे वह पुरुष हो, महिला हो, शूद्र हो या कुछ भी हो, सभी समान होते हैं। अन्यथा, उर्वशी, जो स्वयं एक महिला थी और जो महिलाओं की प्रकृति को जानती थी, ने कहा कि एक महिला का हृदय एक धूर्त लोमड़ी जैसा होता है। यदि कोई आदमी अपनी इंद्रियों को नियंत्रित नहीं कर सकता है, तो वह ऐसे धूर्त लोमड़ियों का शिकार हो जाता है। लेकिन अगर कोई व्यक्ति अपनी इंद्रियों को नियंत्रित कर सकता है, तो उसके द्वारा चालाक, लोमड़ी जैसी महिलाओं द्वारा शिकार किए जाने की कोई संभावना नहीं है। चाणक्य पंडित ने यह भी सलाह दी है कि यदि किसी की पत्नी धूर्त लोमड़ी जैसी है, तो उसे तुरंत अपना गृहस्थ जीवन त्याग कर जंगल में चले जाना चाहिए।

माता यस्य गृहे नास्ति

भार्या चाप्रिय-वादनी

अरण्यं तेना गन्तव्यं

यथारण्यं तथा गृहम्

(चाणक्य-श्लोक 57)

कृष्णभावनापूर्ण गृहस्थों को धूर्त लोमड़ी महिला से बहुत सावधान रहना चाहिए। यदि घर की पत्नी आज्ञाकारी है और कृष्ण चेतना में उसके पति का अनुसरण करती है, तो घर स्वागत योग्य है। अन्यथा व्यक्ति को अपना घर छोड़कर जंगल चले जाना चाहिए।

हित्वात्म-पातं गृहम् अन्ध-कूपम्

वनं गतो यद् धरिम आश्रयेत

(भागवत 7.5.5)

व्यक्ति को वन में जाना चाहिए और भगवान के चरण कमलों की शरण लेनी चाहिए, जो कि भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)