श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 14: पुरुरवा का उर्वशी पर मोहित होना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  9.14.3 
तस्य द‍ृग्भ्योऽभवत् पुत्र: सोमोऽमृतमय: किल ।
विप्रौषध्युडुगणानां ब्रह्मणा कल्पित: पति: ॥ ३ ॥
 
 
अनुवाद
अत्रि के हर्षाश्रुओं से एक पुत्र उत्पन्न हुआ जिसका नाम सोम था, जो चांद था, जो अपने कोमल किरणों के लिए जाना जाता था। भगवान ब्रह्मा ने उसे ब्राह्मणों, औषधियों और नक्षत्रों का निर्देशक नियुक्त किया।
 
From the tears of joy of Atri, a son named Som was born who was blessed with soft rays. Brahmaji appointed him as the director of Brahmins, medicines and stars.
तात्पर्य
वैदिक विवरण के अनुसार, सोम, चंद्रमा के देवता, परमेश्वर के मन से उत्पन्न हुए थे (चंद्रमा मनसो जात: |)। लेकिन यहां हम पाते हैं कि सोम अत्रि की आंखों के आँसुओं से जन्मे थे। यह वैदिक जानकारी के विपरीत प्रतीत होता है, लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है, क्योंकि चंद्रमा का यह जन्म एक अन्य सहस्राब्दि में हुआ है। जब आनंद के कारण आँखों में आंसू आते हैं, तो वे आंसू सुखदायक होते हैं। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर कहते हैं, दृग्भ्या आनंदाश्रुभ्या अत एवामृतमय: : "यहां 'दृग्भ्य:' शब्द का अर्थ है- 'आनंद के आँसुओं से"। इसलिए चंद्रमा के देवता को 'अमृतमय:' यानी "सुखदायक किरणों से भरपूर" कहा जाता है। श्रीमद्-भागवतम् के चतुर्थ सर्ग (4.1.15) में हम यह श्लोक पाते हैं:

अत्रे: पत्नी अनसूया त्रीन्

जज्ञे सुयशस: सुतान्

दत्तं दुर्वाससं सोम

आत्मेश-ब्रह्म-सम्भवान्

यह श्लोक वर्णन करता है कि अत्रि ऋषि की पत्नी अनसूया ने तीन पुत्रों को जन्म दिया- सोम, दुर्वासा और दत्तात्रेय। कहा जाता है कि गर्भधारण के समय अनसूया को अत्रि के आँसुओं से निषेचित किया गया था।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)