अहो रूपमहो भावो नरलोकविमोहनम् ।
को न सेवेत मनुजो देवीं त्वां स्वयमागताम् ॥ २३ ॥
अनुवाद
पुरुरवा बोले: हे सुंदरी, तुम्हारा सौंदर्य अलौकिक है और तुम्हारे हाव-भाव भी अद्भुत हैं। तुम निसंदेह सारे मानव समाज के लिए एक आकर्षण हो। इसलिए चूंकि तुम स्वेच्छा से देवलोक से यहाँ आई हो तो इस पृथ्वी पर ऐसा कौन होगा जो तुम जैसी देवी की सेवा करने को तत्पर न हो?
Pururava said: O beautiful lady, your beauty is amazing and your expressions are also wonderful. Undoubtedly, you are attractive to all human society. Therefore, since you have come here from heaven voluntarily, then who will be there on this earth who will not be ready to serve a goddess like you?
तात्पर्य
उर्वशी के शब्दों से प्रतीत होता है कि स्वर्ग के ग्रहों पर रहन-सहन, खान-पान, व्यवहार एवं वाणी सभी पृथ्वी पर पाए जाने वाले मानकों से भिन्न हैं। स्वर्ग के निवासी मांस और अण्डे जैसी घृणित वस्तुओं का सेवन नहीं करते हैं, वे जो कुछ भी खाते हैं वह घी में पकाया जाता है। वे यौन सम्बन्ध बनाने के अतिरिक्त किसी समय भी स्त्री या पुरुष को नग्न नहीं देखना चाहते। इस प्रकार नग्न या लगभग नग्न रहना असभ्यता है, किन्तु पृथ्वी पर वर्तमान में आधा नగ్न रहना फैशन बन चुका है। और कभी-कभी हिप्पी तो पूर्णतः नग्न रहते हैं। वास्तव में, ऐसे कई क्लब और सोसाइटी हैं। किन्तु स्वर्ग पर ऐसे आचरण की अनुमति नहीं है। स्वर्ग के निवासी वर्ण और शारीरिक बनावट में अत्यन्त सुन्दर होने के अतिरिक्त, सुसंस्कृत और दीर्घायु होते हैं। तथा वे सात्विक और अत्यधिक उत्तम खाने का सेवन करते हैं। ये कुछ भेद हैं स्वर्ग और पृथ्वी के निवासियों के बीच।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥