निमिश्चलमिदं विद्वान् सत्रमारभतात्मवान् ।
ऋत्विग्भिरपरैस्तावन्नागमद् यावता गुरु: ॥ ३ ॥
अनुवाद
महाराज निमि, जो एक आत्म-साक्षात्कारी जीव थे, ने सोचा कि यह जीवन क्षणिक है; इसलिए उन्होंने लंबे समय तक वसिष्ठ की प्रतीक्षा करने के बजाय अन्य पुरोहितों के साथ यज्ञ करना शुरू कर दिया।
Maharaja Nimi was a self-realized soul and therefore he thought that this life is temporary; therefore, instead of waiting for Vasishtha for a long time, he started performing the yajnas through other priests.
तात्पर्य
चाणक्य पंडित कहते हैं, शरीरं क्षण विध्वांसि कल्पांत स्थैरनो गुणाः: “मनुष्य जीवन भौतिक दुनिया में किसी भी क्षण समाप्त हो सकता है, लेकिन इस जीवन में अगर कोई यहू कुछ योग्य काम करता है, तो वह योग्यता इतिहास में हमेशा के लिए अंकित हो जाती है"। यहाँ एक महान व्यक्तित्व, महाराजा निमि हैं, जो इस तथ्य को जानते थे। मानव जीवन रूप में व्यक्ति को ऐसी गतिविधियों का पालन करना चाहिए जिससे अंत में वह अपने घर, वापस भगवान के पास जाए। यही आत्मबोध है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥