'द्वैते' भद्राभद्र-ज्ञान, सब - 'मनोधर्म'
'एई भाल, एई मंद,' - एई सब 'भ्रम'
द्वंद्व के संसार में - अर्थात् भौतिक संसार में - तथाकथित अच्छाई और बुराई दोनों एक ही हैं। इसलिए, इस दुनिया में अच्छे और बुरे, सुख और दुःख के बीच अंतर करना व्यर्थ है क्योंकि ये दोनों मानसिक कल्पनाएँ (मनोधर्म) हैं। क्योंकि यहाँ सब कुछ दुखद और परेशानी भरा है, इसलिए एक कृत्रिम स्थिति पैदा करना और इसका ढोंग करना कि यह खुशियों से भरा है, केवल भ्रम है। तीनों प्रकार के भौतिक स्वरूपों के प्रभाव से ऊपर होने वाले मुक्त व्यक्ति, हर परिस्थिति में ऐसे द्वंद्व से अप्रभावित रहते हैं। वे तथाकथित सुख और दुःख को सहन करने के द्वारा कृष्णभावना में रहते हैं। भगवद्-गीता (2.14) में इसकी पुष्टि भी की गई है:
मात्रा-स्पर्शास तु कौन्तेय
शीतोष्ण-सुख-दुःखदाः
आगामापायिनोऽनित्याः
तान् तितिक्षस्व भारत
"हे कुन्ती के पुत्र, सुख और दुःख की अस्थायी उपस्थिति, और नियत समय में उनका लुप्त हो जाना, सर्दी और गर्मी के मौसम की उपस्थिति और लुप्त होने के समान है। वे इंद्रिय-बोध से उत्पन्न होते हैं, हे भरत के वंशज, और व्यक्ति को बिना विचलित हुए उन्हें सहन करना सीखना चाहिए।" मुक्त व्यक्ति, भगवान की सेवा करने के पारलौकिक मंच पर होने के कारण, तथाकथित सुख और दुख की परवाह नहीं करते हैं। वे जानते हैं कि ये बदलते मौसमों की तरह हैं, जो भौतिक शरीर के संपर्क में आने से समझ में आते हैं। सुख और दुख आते हैं और चले जाते हैं। इसलिए एक पंडित, एक विद्वान व्यक्ति, उनके साथ संबंध नहीं रखता। जैसा कि कहा गया है, गतासून् अगतासूंश्च नानुशोचन्ति पंडिताः। शुरू से ही शरीर मृत है क्योंकि यह पदार्थ का एक ढेर है। इसमें सुख और दुःख की कोई भावना नहीं होती है। क्योंकि शरीर के भीतर आत्मा जीवन की शारीरिक अवधारणा में है, वह सुख और दुख को सहता है, पर ये आते और जाते रहते हैं। यह इस प्रकार समझा जाता है कि मिथिला वंश में जन्मे सभी राजा मुक्त व्यक्ति थे, जो इस दुनिया के तथाकथित सुख और दुख से अप्रभावित थे।
