श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 11: भगवान् रामचन्द्र का विश्व पर राज्य करना  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  9.11.25 
श्रीबादरायणिरुवाच
अथादिशद् दिग्विजये भ्रातृंस्त्रिभुवनेश्वर: ।
आत्मानं दर्शयन् स्वानां पुरीमैक्षत सानुग: ॥ २५ ॥
 
 
अनुवाद
शुकदेव गोस्वामी जी ने उत्तर दिया: अपने छोटे भाई भरत के अनुरोध पर शासन की गद्दी स्वीकार करने के बाद भगवान रामचंद्र जी ने अपने छोटे भाइयों को आदेश दिया कि वे बाहर जाकर पूरे विश्व पर विजय प्राप्त करें जबकि वे स्वयं राजधानी में रहकर सभी नागरिकों और महल में निवास करने वालों को दर्शन देते रहे और अपने अन्य सहायकों के साथ शासन के कामों का निरीक्षण करते रहे।
 
Sukadeva Goswami answered: After accepting the throne at the request of His younger brother Bharat, Lord Ramacandra ordered His younger brothers to go out and conquer the whole world while He Himself remained in the capital and gave darshan to all the citizens and residents of the palace and supervised the affairs of the state along with His other assistants.
तात्पर्य
भगवान का परम व्यक्तित्व अपने किसी भी भक्त या सहायक को इन्द्रिय-तृप्ति में लिप्त नहीं होने देता। भगवान रामचंद्र के छोटे भाई घर में परम व्यक्तित्व भगवान की साक्षात में मौजूद थे, पर प्रभु ने उन्हें बाहर जाने और सारे विश्व में विजय प्राप्त करने का आदेश दिया। यह परिपाटी थी (और यह परिपाटी कुछ स्थानों पर, अभी भी प्रचलित है) कि अन्य सभी राजाओं को सम्राट की श्रेष्ठता स्वीकार करनी पड़ती। यदि किसी छोटे राज्य का राजा सम्राट की श्रेष्ठता स्वीकार नहीं करता, तो उससे युद्ध होता और छोटे राज्य के राजा को सम्राट को अपना सर्वोच्च स्वीकार करना होता, अन्यथा सम्राट के लिए देश पर शासन करना संभव नहीं होता।

भगवान रामचंद्र ने अपने भाइयों को बाहर जाने का आदेश देकर उनपर अपना अनुग्रह दिखाया। वृंदावन में रहने वाले भगवान के बहुत से भक्तों ने वृंदावन छोड़कर कृष्ण-भावना का प्रचार नहीं करने की प्रतिज्ञा ले रखी है। पर भगवान कहते हैं कि कृष्ण-भावना को हर गाँव और हर कस्बे में, सारे विश्व में फैलाना चाहिए। यह स्वयं भगवान चैतन्य महाप्रभु का साफ आदेश है।

पृथ्वीते आछे याता नगर आदि ग्राम

सर्वत्र प्रचार हाइबे मोरा नाम

इसलिए, एक शुद्ध भक्त को भगवान के आदेश का पालन करना चाहिए और एक स्थान पर ठहरे रहकर गलत अहंकार में अपने इन्द्रियों को संतुष्ट नहीं करना चाहिए, यह सोचकर कि वह वृंदावन नहीं छोड़ता और एक एकांत जगह में जप करता है इसलिए वह एक महान भक्त बन गया है। एक भक्त को परम व्यक्तित्व भगवान के आदेश का पालन करना चाहिए। चैतन्य महाप्रभु ने कहा, यारे देख, तारे कह कृष्ण उपदेश। इसलिए, हर भक्त को कृष्ण भावना का प्रचार करना चाहिए, जिस भी व्यक्ति से मिले उससे परम व्यक्तित्व भगवान के आदेश को स्वीकार करने के लिए कहना चाहिए। भगवान कहते हैं, सर्वधर्मं परित्यज्य माम एकं शरणं व्रजः: "सब प्रकार के धर्म का त्याग करो और सिर्फ मेरी शरण में आओ।" यह प्रभु का आदेश है, जो सर्वोच्च सम्राट के रूप में बोलते हैं। हर किसी को इस आदेश को स्वीकार करने के लिए प्रेरित करना चाहिए, क्योंकि यही विजय है (दिग्विजय)। और हर किसी पर जीवन के इस दर्शन को डालने की जिम्मेदारी योद्धाओं, यानी भक्तों की है।

बेशक, वे जो कनिष्ठ अधिकारी हैं, वे प्रचार नहीं करते पर प्रभु उनपर भी दया करते हैं, जैसा उन्होंने अयोध्या में रुककर सामान्य लोगों को दर्शन देने के लिए किया था। किसी को गलती से यह नहीं सोचना चाहिए कि प्रभु ने अपने छोटे भाइयों को अयोध्या छोड़ने के लिए कहा क्योंकि वह विशेष रूप से शहरवासियों का पक्ष ले रहे थे। प्रभु हर किसी पर दया करते हैं, और वह जानते हैं कि हर व्यक्ति को उसकी क्षमता के अनुसार कैसे अनुग्रह दिखाना है। वह जो भगवान के आदेश से चलता है, एक शुद्ध भक्त है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)