पुरुषो रामचरितं श्रवणैरुपधारयन् ।
आनृशंस्यपरो राजन् कर्मबन्धैर्विमुच्यते ॥ २३ ॥
अनुवाद
हे राजन परीक्षित, जो कोई भी व्यक्ति भगवान रामचन्द्र के गुणों से संबंधित कथाओं को श्रवण करता है वह आख़िरकार ईर्ष्या के रोग से मुक्त हो जाएगा और इस तरह कर्मों के बंधन से मुक्त हो जाएगा।
O King Parikshit, anyone who hears with his ears the stories pertaining to the virtues of Lord Ramacandra will ultimately be cured of the disease of jealousy and consequently released from the bondage of karma.
तात्पर्य
यहाँ भौतिक जगत में, हर कोई किसी दूसरे से जलता है। धार्मिक जीवन में भी, कभी-कभी देखने में आता है कि यदि कोई एक भक्त आध्यात्मिक क्रियाकलापों में आगे गया है, तो अन्य भक्त उससे जलते हैं। ऐसे ईर्ष्यालु भक्त जन्म और मृत्यु के बंधन से पूरी तरह से मुक्त नहीं होते हैं। जब तक कोई जन्म और मृत्यु के कारण से पूरी तरह मुक्त नहीं हो जाता, तब तक वह सनातन-धाम या भगवान के शाश्वत लीलाओं में प्रवेश नहीं कर सकता। शरीर के पदनामों से प्रभावित होने के कारण कोई ईर्ष्या करने लगता है, लेकिन मुक्त भक्त का शरीर से कोई लेना-देना नहीं होता है, और इसलिए वह पूरी तरह से परलौकिक स्तर पर होता है। एक भक्त कभी किसी से ईर्ष्या नहीं करता, यहाँ तक कि अपने दुश्मन से भी नहीं। चूँकि भक्त जानता है कि भगवान उसका सर्वोच्च रक्षक है, वह सोचता है, "तथाकथित दुश्मन क्या नुकसान कर सकता है?" इस तरह एक भक्त अपनी सुरक्षा के बारे में आश्वस्त होता है। भगवान कहते हैं, ये यथा माँ प्रपद्यन्ते ताम्स तथाइव भजाम्य अहम्: "जिस अनुपात में कोई मेरे समर्पण करता है, मैं उसी तरह प्रतिक्रिया देता हूँ।" इसलिए एक भक्त को ईर्ष्या से पूरी तरह मुक्त होना चाहिए, खासकर अन्य भक्तों से। अन्य भक्तों से ईर्ष्या करना एक बड़ा अपराध है, एक वैष्णव-अपराध। एक भक्त जो लगातार श्रवण और कीर्तन (श्रवण-कीर्तन) में लगा रहता है, वह निश्चित रूप से ईर्ष्या की बीमारी से मुक्त हो जाता है, और इस तरह वह घर वापस जाने के लिए पात्र हो जाता है, जहां भगवान वापस आते हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥