न तस्य कार्यं करणं च विद्यते
न तत्-समश् चाभ्यधिकश् च दृश्यते
परास्य शक्तिर् विविधैव श्रूयते
स्वाभाविकी ज्ञान-बल-क्रिया च
"परम प्रभु का कुछ भी कार्य नहीं है और कोई भी उसे उसके समान या उससे ऊपर नहीं पाया जाता है, क्योंकि सब कुछ स्वाभाविक और व्यवस्थित रूप से उसकी बहुविध ऊर्जाओं द्वारा किया जाता है।" प्रभु का कोई काम नहीं है (न तस्य कार्यं करणं च विद्यते); वह जो कुछ भी करता है वह उसका शगल है। प्रभु का किसी को बाध्य करने के लिए कोई कर्तव्य नहीं है। फिर भी, वह अपने भक्तों की रक्षा करने या अपने शत्रुओं को मारने के लिए कार्य करता हुआ प्रतीत होता है। बेशक, कोई भी प्रभु का शत्रु नहीं हो सकता, क्योंकि प्रभु से अधिक शक्तिशाली कौन हो सकता है? वास्तव में किसी के भी उसके शत्रु होने का प्रश्न ही नहीं है, लेकिन जब प्रभु लीलाओं में आनंद लेना चाहता है, तो वह इस भौतिक दुनिया में आता है और एक मनुष्य की तरह कार्य करता है, इस प्रकार अपने भक्तों को प्रसन्न करने के लिए अपनी अद्भुत, गौरवशाली गतिविधियों को दिखाता है। उनके भक्त हमेशा प्रभु को विविध गतिविधियों में विजयी देखना चाहते हैं, और इसलिए, उन्हें और स्वयं को प्रसन्न करने के लिए, प्रभु कभी-कभी एक मनुष्य के रूप में कार्य करने और भक्तों की संतुष्टि के लिए अद्भुत, असामान्य लीलाएँ करने के लिए सहमत हो जाते हैं।
