यथा तरोर्मूल-निषेचनेन
त्रयन्ति तत्-स्कन्ध-भुजोपशाखाः ।
प्राणोपहारात्च यथेन्द्रियाणां
तथैव सर्वार्हणमच्युतेज्या।।
"जैसे पेड़ की जड़ों में पानी डालने से तना, शाखाएँ, टहनियाँ और पत्तियाँ नमी से भरी हो जाती हैं, और जैसा पेट को भोजन देने से शरीर की इन्द्रियाँ और अंग काम करना शुरू कर देते हैं, वैसे ही सर्वोच्च भगवान की आराधना से उपदेवता जो सर्वोच्च भगवान का अंग है, तृप्त होते हैं।" यज्ञ करने में सर्वोच्च भगवान की आराधना करना होता है। यहाँ सर्वोच्च भगवान ने सर्वोच्च भगवान की आराधना की। इसलिए यहाँ कहा गया है, भगवान् आत्मानमात्मानम ईजे: भगवान ने स्वयं ही अपनी आराधना की। परन्तु, यह मायावाद दर्शन की पुष्टि नहीं करता है, जिसके अनुसार व्यक्ति स्वयं को सर्वोच्च भगवान समझने लगता है। जीव, जीवित इकाई, सर्वोच्च भगवान से सदैव अलग रहती है। जीवित इकाइयाँ (विभिन्न अंश) कभी भी भगवान के साथ एक नहीं हो सकती है, हालाँकि मायावादी कभी-कभी भगवान द्वारा स्वयं की आराधना की नकल करते हैं। गृहस्थ के रूप में भगवान कृष्ण प्रतिदिन स्वयं ही ध्यान करते थे और उसी प्रकार भगवान रामचंद्र ने स्वयं को संतुष्ट करने के लिए यज्ञ किए थे, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि अन्य साधारण जीव भी अहंग्रोपासना प्रक्रिया को अपनाकर भगवान की अनुकृति करें। ऐसी अनधिकृत आराधना यहाँ नहीं बताई गई है।
