श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 11: भगवान् रामचन्द्र का विश्व पर राज्य करना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  9.11.1 
श्रीशुक उवाच
भगवानात्मनात्मानं राम उत्तमकल्पकै: ।
सर्वदेवमयं देवमीजेऽथाचार्यवान् मखै: ॥ १ ॥
 
 
अनुवाद
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : उसके बाद, भगवान रामचंद्र ने एक आचार्य को स्वीकार किया और भव्य सामग्री के साथ यज्ञ सम्पन्न किए। इस तरह उन्होंने स्वयं की ही पूजा की क्योंकि वे सभी देवताओं के भगवान हैं।
 
Sukadeva Goswami said: Thereafter Lord Ramachandra accepted an acharya and performed the yajna with great pomp and show with the finest paraphernalia. In this way He worshipped Himself because He is the Supreme Lord of all demigods.
तात्पर्य
सर्वार्हणमच्युतेर्ज्या। यदि सर्वोच्च भगवान अच्युत की आराधना की जाती है तो प्रत्येक की आराधना की जाती है। जैसा कि श्रीमद्-भागवतम (4.31.14) में बताया गया है:

यथा तरोर्मूल-निषेचनेन

त्रयन्ति तत्-स्कन्ध-भुजोपशाखाः ।

प्राणोपहारात्च यथेन्द्रियाणां

तथैव सर्वार्हणमच्युतेज्या।।

"जैसे पेड़ की जड़ों में पानी डालने से तना, शाखाएँ, टहनियाँ और पत्तियाँ नमी से भरी हो जाती हैं, और जैसा पेट को भोजन देने से शरीर की इन्द्रियाँ और अंग काम करना शुरू कर देते हैं, वैसे ही सर्वोच्च भगवान की आराधना से उपदेवता जो सर्वोच्च भगवान का अंग है, तृप्त होते हैं।" यज्ञ करने में सर्वोच्च भगवान की आराधना करना होता है। यहाँ सर्वोच्च भगवान ने सर्वोच्च भगवान की आराधना की। इसलिए यहाँ कहा गया है, भगवान् आत्मानमात्मानम ईजे: भगवान ने स्वयं ही अपनी आराधना की। परन्तु, यह मायावाद दर्शन की पुष्टि नहीं करता है, जिसके अनुसार व्यक्ति स्वयं को सर्वोच्च भगवान समझने लगता है। जीव, जीवित इकाई, सर्वोच्च भगवान से सदैव अलग रहती है। जीवित इकाइयाँ (विभिन्न अंश) कभी भी भगवान के साथ एक नहीं हो सकती है, हालाँकि मायावादी कभी-कभी भगवान द्वारा स्वयं की आराधना की नकल करते हैं। गृहस्थ के रूप में भगवान कृष्ण प्रतिदिन स्वयं ही ध्यान करते थे और उसी प्रकार भगवान रामचंद्र ने स्वयं को संतुष्ट करने के लिए यज्ञ किए थे, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि अन्य साधारण जीव भी अहंग्रोपासना प्रक्रिया को अपनाकर भगवान की अनुकृति करें। ऐसी अनधिकृत आराधना यहाँ नहीं बताई गई है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)