श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 10: परम भगवान् रामचन्द्र की लीलाएँ  »  श्लोक 54
 
 
श्लोक  9.10.54 
एकपत्नीव्रतधरो राजर्षिचरित: शुचि: ।
स्वधर्मं गृहमेधीयं शिक्षयन् स्वयमाचरत् ॥ ५४ ॥
 
 
अनुवाद
भगवान रामचंद्र ने एक पत्नी के प्रति वफादार रहने और अन्य किसी स्त्री से कोई संबंध न रखने का व्रत लिया था। वे एक साधु राजा थे और उनका चरित्र उच्च आदर्शों से ओतप्रोत था। क्रोध जैसे विकारों ने उन्हें कभी छुआ तक नहीं था। उन्होंने हर व्यक्ति को, विशेषकर गृहस्थों को, वर्णाश्रम-धर्म के अनुसार सदैव आचरण करने का उपदेश दिया। इस तरह, उन्होंने अपने निजी जीवन और कृत्यों के माध्यम से आम जनता को शिक्षा दी।
 
Lord Ramachandra had taken a vow to have only one wife and not to have relations with any other woman. He was a saintly king and had a good character; anger never touched him. He taught everyone, especially the householders, the lesson of good conduct in the form of Varnashrama Dharma. In this way, he taught the general public through his personal activities.
तात्पर्य
एक-पत्नी-व्रत, एक ही पत्नी को स्वीकार करना, भगवान रामचंद्र द्वारा स्थापित एक भव्य उदाहरण है। व्यक्ति को एक से अधिक पत्नी नहीं अपनानी चाहिए। बेशक, उस समय लोग एक से अधिक पत्नियाँ लेते थे। यहाँ तक कि भगवान रामचंद्र के पिता ने भी एक से अधिक पत्नियों को स्वीकार किया था। लेकिन भगवान रामचंद्र एक आदर्श राजा थे, उन्होंने केवल एक ही पत्नी को स्वीकार किया, माता सीता। जब माता सीता का अपहरण रावण और राक्षसों ने कर लिया, तो श्री भगवान रामचंद्र, परमेश्र्वर के रूप में, सैकड़ों-हज़ारों सीताओं से विवाह कर सकते थे, लेकिन उन्होंने अपने प्रति अपनी पत्नी की वफ़ादारी को दर्शाने के लिए, रावण से युद्ध किया और अंत में उसे मार डाला। भगवान ने रावण को दंडित किया और अपनी पत्नी को बचाया ताकि मनुष्यों को निर्देश दिया जा सके कि उनकी केवल एक ही पत्नी होनी चाहिए। भगवान रामचंद्र ने केवल एक पत्नी को स्वीकार किया और एक महान चरित्र को प्रकट किया, इस प्रकार उन्होंने गृहस्थों के लिए एक उदाहरण स्थापित किया। एक गृहस्थ को भगवान रामचंद्र के आदर्श के अनुसार रहना चाहिए, जिन्होंने दिखाया कि एक आदर्श व्यक्ति कैसे होना चाहिए। एक गृहस्थ होना या पत्नी और बच्चों के साथ रहना कभी भी निन्दनीय नहीं है, बशर्ते कि व्यक्ति वर्णाश्रम-धर्म के नियमों के अनुसार जीवन व्यतीत करे। जो लोग इन सिद्धांतों के अनुसार जीते हैं, चाहे गृहस्थ के रूप में, ब्रह्मचारी के रूप में या वानप्रस्थ के रूप में, सभी समान रूप से महत्वपूर्ण हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)