अग्रहीदासनं भ्रात्रा प्रणिपत्य प्रसादित: ।
प्रजा: स्वधर्मनिरता वर्णाश्रमगुणान्विता: ।
जुगोप पितृवद् रामो मेनिरे पितरं च तम् ॥ ५० ॥
अनुवाद
तब भरत की पूरी तरह से आत्मसमर्पण और समर्पण से प्रसन्न होकर भगवान रामचंद्र ने राज्य की राजगद्दी स्वीकार कर ली। वे नागरिकों की रक्षा एक पिता की तरह करने लगे, और नागरिकों ने भी वर्ण और आश्रम के अनुसार अपने-अपने व्यावसायिक कर्तव्यों में लगकर उन्हें अपने पिता के समान स्वीकार कर लिया।
Then, pleased with Bharat's complete surrender, Lord Rama accepted the throne. He started protecting the subjects like a father and the subjects too accepted him like a father by engaging in their respective occupational activities according to their caste and ashram.
तात्पर्य
लोग राम-राज्य के आदर्श के काफ़ी शौक़ीन हैं, और आज भी कभी-कभी नेता राम-राज्य नाम से पार्टी बनाते हैं, लेकिन दुर्भाग्य से उनमें भगवान राम के प्रति कोई श्रद्धा नहीं होती। कई बार ऐसा कहा जाता है कि लोगों को ईश्वर के बिना ही ईश्वरीय राज्य चाहिए। लेकिन ऐसी कोई भी आकांक्षा कभी भी पूरी नहीं हो पाती। एक अच्छा शासन तभी बन पाता है, जब नागरिकों और सरकार के बीच का संबंध वैसा हो जैसा भगवान रामचंद्र और उनके नागरिकों का था। भगवान रामचंद्र ने अपने राज का संचालन ठीक उसी तरह से किया था, जैसे कोई पिता अपने बच्चों की देखभाल करता है। और भगवान रामचंद्र के अच्छे शासन के कारण नागरिक उन्हें अपना पिता मानते थे। इसलिए नागरिकों और सरकार का रिश्ता पिता-पुत्र जैसा ही होना चाहिए। जब किसी परिवार के बेटे-बेटियाँ अच्छे संस्कारों वाले होते हैं, तो वे माता-पिता की आज्ञा मानते हैं। और जब पिता योग्य होता है, तो वह अपने बच्चों की अच्छी तरह से देखभाल करता है। जैसा कि यहाँ कहा गया है कि 'स्वधर्म निरता वर्णाश्रम गुणां विता', इसलिए नागरिक अच्छे थे, क्योंकि वे वर्ण और आश्रम की संस्था को मानते थे। इसमें वर्ण का विभाजन ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र में होता था, तो वहीं आश्रम का विभाजन ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास में होता था। यही सही मायनों में मानवीय सभ्यता है। लोगों को वर्ण-आश्रम व्यवस्था के अनुसार प्रशिक्षित होना चाहिए। जैसा कि गीता (4.13) में भी बताया गया है, 'चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुण-कर्म-विभागशः'। अर्थात् गुण और कर्म के आधार पर ही चार वर्णों की स्थापना होनी चाहिए। अच्छे शासन का पहला सिद्धांत यह है कि उसे इस वर्ण आश्रम व्यवस्था को स्थापित करना चाहिए। वर्ण आश्रम का उद्देश्य लोगों को ईश्वर के प्रति जागरूक बनाना है। 'वर्णाश्रमाचारवता पुरुषेण परः पुमान विष्णुराराध्यते'। पूरा वर्ण आश्रम व्यवस्था ही लोगों को वैष्णव बनाने के लिए बनी है। 'विष्णुरस्य देवता'। जब लोग भगवान विष्णु की सर्वोच्च भगवान के तौर पर पूजा करते हैं, तो वे वैष्णव बन जाते हैं। इसलिए लोगों को भी वर्ण और आश्रम व्यवस्था के माध्यम से ही वैष्णव बनने के लिए प्रशिक्षित किया जाना चाहिए, जैसा कि भगवान रामचंद्र के शासन में था। तब हर कोई वर्ण आश्रम के सिद्धांतों का पालन करने के लिए पूरी तरह से प्रशिक्षित था। केवल कानून और अध्यादेशों को लागू करवाने से ही नागरिक आज्ञाकारी और कानून के दायरे में रहने वाले नहीं बन सकते। ऐसा असंभव है। पूरी दुनिया मे इतने सारे राज्य, विधानसभाएँ और संसदें हैं, लेकिन इसके बाद भी नागरिक दुष्ट प्रवृत्ति के और चोर हैं। इसलिए अच्छे नागरिकों को बनाया नहीं जा सकता, उन्हें प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। जिस तरह से स्कूल और कॉलेज होते हैं जो छात्रों को केमिकल इंजीनियर, वकील या अन्य विभागों के विशेषज्ञ बनाने के लिए प्रशिक्षित करते हैं, उसी तरह से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यासी बनने के लिए भी स्कूल और कॉलेज होने चाहिए। इससे अच्छे नागरिक के लिए प्रारंभिक परिस्थिति बन पाएगी ('वर्णाश्रम गुणां विता')। सामान्य तौर पर अगर राजा या राष्ट्रपति 'राजर्षि' होता है, तो नागरिकों और मुख्य कार्यपालक अधिकारी का संबंध साफ़ होगा। और राज्य में अशांति की कोई संभावना नहीं होगी क्योंकि चोरों और दुष्ट प्रवृत्ति के लोगों की संख्या घट जाएगी। लेकिन कलियुग में वर्ण आश्रम व्यवस्था की उपेक्षा की जाती है, इसलिए आम तौर पर लोग चोर और दुष्ट प्रवृत्ति के होते हैं। लोकतंत्र व्यवस्था में ऐसे चोर और दुष्ट प्रवृत्ति के लोग स्वाभाविक रूप से दूसरे चोरों और दुष्ट लोगों से चंदा इकट्ठा करते हैं। और इस तरह से हर सरकार में अराजकता होती है, और कोई भी खुश नहीं होता। लेकिन अच्छे शासन की मिसाल भगवान रामचंद्र के शासनकाल में मिलती है। अगर लोग इसी मिसाल पर चलें, तो पूरी दुनिया में अच्छे शासन की स्थापना हो जाएगी।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥