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bhagavat 9.10.35-38: जब भरतजी को ज्ञात हुआ कि भगवान श्री रामचन्द्र अपनी राजधानी अयोध्या लौट रहे हैं तो उन्होंने तुरंत भगवान श्री रामचन्द्र की पादुकाएँ अपने सिर पर रखीं और नन्दिग्राम स्थित अपने डेरे से बाहर आए। भरतजी के साथ मंत्रीगण, पुरोहितगण एवं अन्य सम्मानित नागरिक थे, मधुर संगीत बजाते हुए व्यावसायिक संगीतकार थे और विद्वान ब्राह्मण ऊँचे स्वर से वैदिक मंत्रों का पाठ कर रहे थे। जुलूस में सुंदर घोड़ों से जुते रथ थे जिनकी लगाम स्वर्ण रस्सियों की बनी थी। ये रथ सुनहरी कढ़ाई वाली पताकाओं और विभिन्न आकार-प्रकार की अन्य पताकाओं से सजाए गए थे। सैनिक स्वर्ण कवच पहने हुए थे, सेवक पान-सुपारी लिए हुए थे और साथ में कई प्रसिद्ध सुंदर वेश्याएँ भी थीं। कई सेवक पैदल चल रहे थे और वे छत्र, चंवर, विभिन्न प्रकार के अनमोल रत्न और शाही स्वागत के लिए उपयुक्त अन्य सामान लिए हुए थे। इस प्रकार, प्रेम के आनंद से ओतप्रोत हृदय और आँखों में आँसू लिए भरतजी भगवान श्री रामचन्द्र के पास पहुँचे और अत्यंत भावविभोर होकर उनके चरणकमलों पर गिर गए।   |   bhagavat अध्याय 9.10: परम भगवान् रामचन्द्र की लीलाएँ   ।   bhagavat स्कन्ध 9: मुक्ति   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 10: परम भगवान् रामचन्द्र की लीलाएँ  »  श्लोक 35-38
 
 
श्लोक  9.10.35-38 
भरत: प्राप्तमाकर्ण्य पौरामात्यपुरोहितै: ।
पादुके शिरसि न्यस्य रामं प्रत्युद्यतोऽग्रजम् ॥ ३५ ॥
नन्दिग्रामात् स्वशिबिराद् गीतवादित्रनि:स्वनै: ।
ब्रह्मघोषेण च मुहु: पठद्भ‍िर्ब्रह्मवादिभि: ॥ ३६ ॥
स्वर्णकक्षपताकाभिर्हैमैश्चित्रध्वजै रथै: ।
सदश्वै रुक्‍मसन्नाहैर्भटै: पुरटवर्मभि: ॥ ३७ ॥
श्रेणीभिर्वारमुख्याभिर्भृत्यैश्चैव पदानुगै: ।
पारमेष्ठ्यान्युपादाय पण्यान्युच्चावचानि च ।
पादयोर्न्यपतत् प्रेम्णा प्रक्लिन्नहृदयेक्षण: ॥ ३८ ॥
 
 
अनुवाद
जब भरतजी को ज्ञात हुआ कि भगवान श्री रामचन्द्र अपनी राजधानी अयोध्या लौट रहे हैं तो उन्होंने तुरंत भगवान श्री रामचन्द्र की पादुकाएँ अपने सिर पर रखीं और नन्दिग्राम स्थित अपने डेरे से बाहर आए। भरतजी के साथ मंत्रीगण, पुरोहितगण एवं अन्य सम्मानित नागरिक थे, मधुर संगीत बजाते हुए व्यावसायिक संगीतकार थे और विद्वान ब्राह्मण ऊँचे स्वर से वैदिक मंत्रों का पाठ कर रहे थे। जुलूस में सुंदर घोड़ों से जुते रथ थे जिनकी लगाम स्वर्ण रस्सियों की बनी थी। ये रथ सुनहरी कढ़ाई वाली पताकाओं और विभिन्न आकार-प्रकार की अन्य पताकाओं से सजाए गए थे। सैनिक स्वर्ण कवच पहने हुए थे, सेवक पान-सुपारी लिए हुए थे और साथ में कई प्रसिद्ध सुंदर वेश्याएँ भी थीं। कई सेवक पैदल चल रहे थे और वे छत्र, चंवर, विभिन्न प्रकार के अनमोल रत्न और शाही स्वागत के लिए उपयुक्त अन्य सामान लिए हुए थे। इस प्रकार, प्रेम के आनंद से ओतप्रोत हृदय और आँखों में आँसू लिए भरतजी भगवान श्री रामचन्द्र के पास पहुँचे और अत्यंत भावविभोर होकर उनके चरणकमलों पर गिर गए।
 
When Bharata came to know that Lord Ramachandra was returning to his capital Ayodhya, he immediately put the Lord's sandals on his head and came out of his tent in Nandigram. Bharata was accompanied by ministers, priests, other respectable citizens, professional singers singing melodious songs and learned Brahmins reciting Vedic mantras loudly. Behind them were chariots drawn by beautiful horses with bridles made of golden ropes. These chariots were decorated with golden-bordered banners and other banners of various shapes and sizes. The soldiers were equipped with golden armour, servants were carrying betel nuts and many famous beautiful prostitutes. Many servants were walking on foot and they were carrying umbrellas, fans, precious gems and various suitable royal articles. Thus, with a heart moist with love and eyes filled with tears, Bharata approached Lord Ramachandra and fell at his lotus feet, overwhelmed with emotion.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)