अवजानंति माम मुढा
मानुषीं तनुमाश्रितम्
परम् भावम जानंतो
ममा भूतामहेश्वरम्
जो भगवान की आध्यात्मिक शक्ति नहीं जानता, वह भगवान को एक साधारण मनुष्य के रूप में सोचता है। लेकिन भगवान का मन, बुद्धि और इंद्रियाँ कभी भी भौतिक स्थितियों से प्रभावित नहीं हो सकते। इस तथ्य को आगे स्कंद पुराण में समझाया गया है, जैसा कि माधवाचार्य ने उद्धृत किया है:
नित्य-पूर्ण-सुख-ज्ञान-
स्वरूपो सौ यतो विभुः
अतोस्य राम इत्याख्या
तस्य दुःखं कुतोऽण्वपि
तथापि लोक-शिक्षार्थम्
अदुःखो दुःख-वर्तिवत्
अंतरहितां लोक-दृष्ट्या
सीतामासीत् स्मरन इव
ज्ञापनार्थं पुनर् नित्य-
संबंधः स्वात्मनः श्रीयाः
अयोध्याया विनिर्गच्छन्
सर्व-लोकास्य चेश्वरः
प्रत्यक्षं तु श्रीया सार्धं
जगामान आदिर अव्ययः
नक्षत्र-मास-गणितं
त्रयोदश-सहस्रकम्
ब्रह्मलोक-समं चक्रे
समस्तं क्षिति-मंडलम्
रामो रामो राम इति
सर्वेषाम भवत् तदा
सर्वोरमयमयो लोको
यदा रामस्त्वपालयत्
वास्तव में रावण के लिए सीता को छीनना असंभव था। रावण ने जो सीता का रूप लिया था वो माँ सीता का एक मायावी प्रतिनिधित्व था - माया-सीता। जब सीता की आग में परीक्षा ली गई थी, तो यह माया-सीता जल गई थी और असली सीता आग से बाहर निकली थी।
इस उदाहरण से प्राप्त एक और समझ यह है कि एक महिला, चाहे भौतिक दुनिया में कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, उसे सुरक्षा दी जानी चाहिए, क्योंकि जैसे ही वह असुरक्षित हो जाती है, उसका रावण जैसे राक्षसों द्वारा शोषण किया जाएगा। यहां शब्द vaideha-rāja-duhitari यह दर्शाते हैं कि माता सीता के भगवान रामचंद्र से विवाह से पहले, उनकी सुरक्षा उनके पिता, वैदेह-राज द्वारा की जाती थी। और जब उनका विवाह हुआ, तो उनकी सुरक्षा उनके पति द्वारा की जाती थी। इसलिए निष्कर्ष यह है कि एक महिला को हमेशा सुरक्षित रखा जाना चाहिए। वैदिक नियम के अनुसार, एक महिला के स्वतंत्र होने (asamakṣam) के लिए कोई गुंजाइश नहीं है, क्योंकि एक महिला स्वतंत्र रूप से अपनी सुरक्षा नहीं कर सकती है।
