श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 9: मुक्ति  »  अध्याय 10: परम भगवान् रामचन्द्र की लीलाएँ  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  9.10.11 
रक्षोऽधमेन वृकवद् विपिनेऽसमक्षं
वैदेहराजदुहितर्यपयापितायाम् ।
भ्रात्रा वने कृपणवत् प्रियया वियुक्त:
स्त्रीसङ्गिनां गतिमिति प्रथयंश्चचार ॥ ११ ॥
 
 
अनुवाद
जब रामचन्द्र जंगल में चले गये और लक्ष्मण भी वहाँ नहीं थे, तो सभी राक्षसों में से सबसे दुष्ट, रावण ने विदेह राजा की पुत्री सीतादेवी का अपहरण उसी तरह कर लिया, जैसे एक बाघ असुरक्षित भेड़ को तब पकड़ लेता है जब गडरिया वहाँ नहीं होता। तब भगवान रामचन्द्र अपने भाई लक्ष्मण के साथ जंगल में इस तरह भटकते रहे जैसे अपनी पत्नी के वियोग में कोई बहुत दुखी व्यक्ति भटकता हो। इस तरह उन्होंने अपने निजी उदाहरण से एक स्त्री से बहुत अधिक लगाव रखने वाले पुरुष की स्थिति दिखायी।
 
When Ramachandraji entered the forest and Lakshmana was not there, the evil demon Ravana kidnapped Sitadevi, the daughter of the Videha king, in the same manner as a tiger catches an unprotected sheep in the absence of a shepherd. Then Ramachandraji started roaming in the forest with his brother Lakshmana as if a very miserable person was roaming in the absence of his wife. In this way, by his personal example, he demonstrated the condition of a woman-loving man.
तात्पर्य
इस श्लोक में शब्द 'स्त्री-संगिनां गति इति' इंगित करते हैं कि स्त्रियों से जुड़े व्यक्ति की स्थिति स्वयं भगवान ने दिखाई। नैतिक निर्देश के अनुसार 'गृहे नारी विवर्जयेत्' जब कोई यात्रा पर जाता है तो उसे अपनी पत्नी को नहीं लाना चाहिए। पहले पुरुष बिना साधनों के यात्रा करते थे, लेकिन फिर भी जहाँ तक संभव हो, जब कोई घर छोड़ता है तो उसे अपनी पत्नी को अपने साथ नहीं ले जाना चाहिए, ख़ासकर अगर वह भगवान रामचंद्र जैसी स्थिति में है जब उन्हें उनके पिता के आदेश पर निर्वासित किया गया। जंगल में हो या घर पर, अगर किसी को स्त्रियों से लगाव है, तो यह लगाव हमेशा परेशानी देता है, जैसा कि भगवान ने स्वयं अपने व्यक्तिगत उदाहरण से दिखाया। बेशक, यह स्त्री-संगी का भौतिक पक्ष है, लेकिन भगवान रामचंद्र की स्थिति आध्यात्मिक है क्योंकि वो भौतिक दुनिया के नहीं हैं। 'नारायणः परो व्यक्तः': नारायण भौतिक सृष्टि के परे हैं। क्योंकि वे भौतिक दुनिया के निर्माता हैं, वे भौतिक दुनिया की स्थितियों के अधीन नहीं हैं। भगवान रामचंद्र का सीता से अलग होना आध्यात्मिक रूप से विप्रलंभ के रूप में जाना जाता है, जो भगवान के आध्यात्मिक व्यक्ति के आनंदमयी शक्ति का एक कार्य है जो आध्यात्मिक दुनिया में सुखद प्रेम की भावना है। आध्यात्मिक दुनिया में, भगवान के प्रेम के सभी संबंध होते हैं, सत्त्विक, संचारी, विलाप, मूर्छा और उन्माद के रूप में जाने जाने वाले लक्षणों को प्रदर्शित करते हैं। इस तरह जब भगवान रामचंद्र सीता से अलग हुए, तो ये सभी आध्यात्मिक लक्षण प्रकट हुए। भगवान न तो अवैयक्तिक हैं और न ही नपुंसक हैं बल्कि वो सच्चिदानंद-विग्रह हैं, ज्ञान और आनंद का शाश्वत रूप हैं। इस प्रकार, उनके पास आध्यात्मिक आनंद के सभी लक्षण हैं। अपने प्रिय से अलग होने का एहसास होना भी आध्यात्मिक आनंद की एक वस्तु है। जैसा कि श्रील स्वरूप दामोदर गोस्वामी ने समझाया, 'राधा-कृष्ण-प्रणय-विकृतिर ह्लादिनी-शक्तिः', राधा और कृष्ण के बीच प्रेम के व्यवहार भगवान की आनंदमयी शक्ति के रूप में प्रदर्शित किए जाते हैं। भगवान सभी आनंद के मूल स्रोत हैं, सभी आनंद के भंडार हैं। इसलिए भगवान रामचंद्र ने आध्यात्मिक और भौतिक दोनों रूप से सत्य को प्रकट किया। भौतिक रूप से जो स्त्रियों से लगाव रखते हैं वो पीड़ित होते हैं, लेकिन आध्यात्मिक रूप से जब भगवान और उनकी आनंदमयी शक्ति के बीच अलगाव की भावनाएँ होती हैं तो भगवान का आध्यात्मिक आनंद बढ़ जाता है। इसे आगे भगवत गीता (9.11) में समझाया गया है:

अवजानंति माम मुढा

मानुषीं तनुमाश्रितम्

परम् भावम जानंतो

ममा भूतामहेश्वरम्

जो भगवान की आध्यात्मिक शक्ति नहीं जानता, वह भगवान को एक साधारण मनुष्य के रूप में सोचता है। लेकिन भगवान का मन, बुद्धि और इंद्रियाँ कभी भी भौतिक स्थितियों से प्रभावित नहीं हो सकते। इस तथ्य को आगे स्कंद पुराण में समझाया गया है, जैसा कि माधवाचार्य ने उद्धृत किया है:

नित्य-पूर्ण-सुख-ज्ञान-

स्वरूपो सौ यतो विभुः

अतोस्य राम इत्याख्या

तस्य दुःखं कुतोऽण्वपि

तथापि लोक-शिक्षार्थम्

अदुःखो दुःख-वर्तिवत्

अंतरहितां लोक-दृष्ट्या

सीतामासीत् स्मरन इव

ज्ञापनार्थं पुनर् नित्य-

संबंधः स्वात्मनः श्रीयाः

अयोध्याया विनिर्गच्छन्

सर्व-लोकास्य चेश्वरः

प्रत्यक्षं तु श्रीया सार्धं

जगामान आदिर अव्ययः

नक्षत्र-मास-गणितं

त्रयोदश-सहस्रकम्

ब्रह्मलोक-समं चक्रे

समस्तं क्षिति-मंडलम्

रामो रामो राम इति

सर्वेषाम भवत् तदा

सर्वोरमयमयो लोको

यदा रामस्त्वपालयत्

वास्तव में रावण के लिए सीता को छीनना असंभव था। रावण ने जो सीता का रूप लिया था वो माँ सीता का एक मायावी प्रतिनिधित्व था - माया-सीता। जब सीता की आग में परीक्षा ली गई थी, तो यह माया-सीता जल गई थी और असली सीता आग से बाहर निकली थी।

इस उदाहरण से प्राप्त एक और समझ यह है कि एक महिला, चाहे भौतिक दुनिया में कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, उसे सुरक्षा दी जानी चाहिए, क्योंकि जैसे ही वह असुरक्षित हो जाती है, उसका रावण जैसे राक्षसों द्वारा शोषण किया जाएगा। यहां शब्द vaideha-rāja-duhitari यह दर्शाते हैं कि माता सीता के भगवान रामचंद्र से विवाह से पहले, उनकी सुरक्षा उनके पिता, वैदेह-राज द्वारा की जाती थी। और जब उनका विवाह हुआ, तो उनकी सुरक्षा उनके पति द्वारा की जाती थी। इसलिए निष्कर्ष यह है कि एक महिला को हमेशा सुरक्षित रखा जाना चाहिए। वैदिक नियम के अनुसार, एक महिला के स्वतंत्र होने (asamakṣam) के लिए कोई गुंजाइश नहीं है, क्योंकि एक महिला स्वतंत्र रूप से अपनी सुरक्षा नहीं कर सकती है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)