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श्लोक 8.9.29  |
यद् युज्यतेऽसुवसुकर्ममनोवचोभि-
र्देहात्मजादिषु नृभिस्तदसत् पृथक्त्वात् ।
तैरेव सद् भवति यत् क्रियतेऽपृथक्त्वात्
सर्वस्य तद् भवति मूलनिषेचनं यत् ॥ २९ ॥ |
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| अनुवाद |
| मानव समाज में मनुष्य मन, वाणी और कर्म से अपने धन और जीवन की सुरक्षा के लिए अनेक कार्य करता है। लेकिन ये सारे कार्य शरीर या इंद्रियों की तृप्ति के लिए ही किए जाते हैं। भक्ति से अलग होने के कारण ये सभी गतिविधियाँ निराशाजनक होती हैं। किन्तु जब ये ही कार्य भगवान को प्रसन्न करने के लिए किए जाते हैं, तो उनके लाभकारी परिणाम सभी को मिलते हैं, जैसे पेड़ की जड़ में पानी डालने पर वह पूरे पेड़ में फैल जाता है। |
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| मानव समाज में मनुष्य मन, वाणी और कर्म से अपने धन और जीवन की सुरक्षा के लिए अनेक कार्य करता है। लेकिन ये सारे कार्य शरीर या इंद्रियों की तृप्ति के लिए ही किए जाते हैं। भक्ति से अलग होने के कारण ये सभी गतिविधियाँ निराशाजनक होती हैं। किन्तु जब ये ही कार्य भगवान को प्रसन्न करने के लिए किए जाते हैं, तो उनके लाभकारी परिणाम सभी को मिलते हैं, जैसे पेड़ की जड़ में पानी डालने पर वह पूरे पेड़ में फैल जाता है। |
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| इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध आठ के अंतर्गत नौवाँ अध्याय समाप्त होता है । |
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