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श्लोक 8.9.25  |
चक्रेण क्षुरधारेण जहार पिबत: शिर: ।
हरिस्तस्य कबन्धस्तु सुधयाप्लावितोऽपतत् ॥ २५ ॥ |
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| अनुवाद |
| भगवान हरि ने अपने छुरे जैसा तेज़ धार वाला चक्र चलाकर एकदम से राहु का सिर काट दिया। जब राहु का सिर उसके शरीर से कट गया तो वह शरीर अमृत का स्पर्श न होने के कारण जीवित नहीं रह पाया। |
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| भगवान हरि ने अपने छुरे जैसा तेज़ धार वाला चक्र चलाकर एकदम से राहु का सिर काट दिया। जब राहु का सिर उसके शरीर से कट गया तो वह शरीर अमृत का स्पर्श न होने के कारण जीवित नहीं रह पाया। |
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