श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 9: मोहिनी-मूर्ति के रूप में भगवान् का अवतार  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  8.9.19 
असुराणां सुधादानं सर्पाणामिव दुर्नयम् ।
मत्वा जातिनृशंसानां न तां व्यभजदच्युत: ॥ १९ ॥
 
 
अनुवाद
असुर स्वभाव से साँप की तरह टेढ़े होते हैं। इसलिए, उन्हें अमृत का हिस्सा देना बिल्कुल भी संभव नहीं था क्योंकि यह साँप को दूध पिलाने के समान खतरनाक होता। यह सोचकर, अच्युत भगवान् ने असुरों को अमृत में हिस्सा नहीं दिया।
 
असुर स्वभाव से साँप की तरह टेढ़े होते हैं। इसलिए, उन्हें अमृत का हिस्सा देना बिल्कुल भी संभव नहीं था क्योंकि यह साँप को दूध पिलाने के समान खतरनाक होता। यह सोचकर, अच्युत भगवान् ने असुरों को अमृत में हिस्सा नहीं दिया।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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