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श्लोक 8.9.11  |
श्रीशुक उवाच
इति ते क्ष्वेलितैस्तस्या आश्वस्तमनसोऽसुरा: ।
जहसुर्भावगम्भीरं ददुश्चामृतभाजनम् ॥ ११ ॥ |
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| अनुवाद |
| श्रीशुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : मोहिनी-मूर्ति के ठिठोलियों भरे शब्द सुनकर सभी असुर अत्यधिक आश्वस्त हो गए। उन्होंने मुस्कराहट के साथ हंसते हुए अंततः अमृत घट उनके हाथों में थमा दिया। |
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| श्रीशुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : मोहिनी-मूर्ति के ठिठोलियों भरे शब्द सुनकर सभी असुर अत्यधिक आश्वस्त हो गए। उन्होंने मुस्कराहट के साथ हंसते हुए अंततः अमृत घट उनके हाथों में थमा दिया। |
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