श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 7: शिवजी द्वारा विषपान से ब्रह्माण्ड की रक्षा  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  8.7.8 
विलोक्य विघ्नेशविधिं तदेश्वरो
दुरन्तवीर्योऽवितथाभिसन्धि: ।
कृत्वा वपु: कच्छपमद्भ‍ुतं महत्
प्रविश्य तोयं गिरिमुज्जहार ॥ ८ ॥
 
 
अनुवाद
भगवान् ने अपनी इच्छा से जैसी स्थिति बनाई थी, उसे देखकर अनंत शक्ति वाले और अटल संकल्प वाले भगवान ने कछुए का अद्भुत रूप धरा और जल में प्रवेश करके विशाल मंदरा पर्वत को उठा लिया।
 
भगवान् ने अपनी इच्छा से जैसी स्थिति बनाई थी, उसे देखकर अनंत शक्ति वाले और अटल संकल्प वाले भगवान ने कछुए का अद्भुत रूप धरा और जल में प्रवेश करके विशाल मंदरा पर्वत को उठा लिया।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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