श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 7: शिवजी द्वारा विषपान से ब्रह्माण्ड की रक्षा  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  8.7.42 
तत: करतलीकृत्य व्यापि हालाहलं विषम् ।
अभक्षयन्महादेव: कृपया भूतभावन: ॥ ४२ ॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात्, समाज के लिए शुभ अथवा उपकारी कार्य करने में समर्पित शिवजी ने दयापूर्वक सारा ज़हर अपनी हथेली पर रखा और उसे पी गये।
 
Thereafter, Lord Shiva, who was devoted to auspicious and beneficial work for humanity, graciously placed all the poison in his palm and drank it.
तात्पर्य
यद्यपि विष की इतनी अधिक मात्रा थी कि वह सारे ब्रह्मांड में फैल गया था, भगवान शिव की इतनी अधिक शक्ति थी कि उन्होंने विष को इतनी कम मात्रा में घटा दिया कि वह इसे अपनी हथेली में रख सके। किसी को भी भगवान शिव की नकल करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। भगवान शिव वो सब कर सकते हैं जो वो चाहे पर वो लोग जो भगवान शिव की नकल करके गांजा और अन्य जहरीली चीजे लेने की कोशिश करते हैं वो ऐसी हरकतों की वजह से मारे जायेंगे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)