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bhagavat 8.7.40: हे मेरी विनम्र पत्नी भवानी! जब कोई दूसरों के लिए अच्छे काम करता है, तो भगवान हरि प्रसन्न होते हैं। और जब भगवान प्रसन्न होते हैं, तब मैं भी प्रसन्न होता हूँ, और साथ ही सभी अन्य जीव भी प्रसन्न होते हैं। अतः मुझे यह विष पीने दो, क्योंकि इससे मेरे द्वारा सभी जीव सुखी हो जाएँगे।   |   bhagavat अध्याय 8.7: शिवजी द्वारा विषपान से ब्रह्माण्ड की रक्षा   ।   bhagavat स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 7: शिवजी द्वारा विषपान से ब्रह्माण्ड की रक्षा  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  8.7.40 
पुंस: कृपयतो भद्रे सर्वात्मा प्रीयते हरि: ।
प्रीते हरौ भगवति प्रीयेऽहं सचराचर: ।
तस्मादिदं गरं भुञ्जे प्रजानां स्वस्तिरस्तु मे ॥ ४० ॥
 
 
अनुवाद
हे मेरी विनम्र पत्नी भवानी! जब कोई दूसरों के लिए अच्छे काम करता है, तो भगवान हरि प्रसन्न होते हैं। और जब भगवान प्रसन्न होते हैं, तब मैं भी प्रसन्न होता हूँ, और साथ ही सभी अन्य जीव भी प्रसन्न होते हैं। अतः मुझे यह विष पीने दो, क्योंकि इससे मेरे द्वारा सभी जीव सुखी हो जाएँगे।
 
O my noble wife Bhavani! When one does acts of benevolence for others, Lord Hari is very pleased and when the Lord is pleased, I too am very pleased along with all other beings. Therefore let me drink this poison because through me all beings will be able to become happy in this way.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)