श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 7: शिवजी द्वारा विषपान से ब्रह्माण्ड की रक्षा  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  8.7.39 
प्राणै: स्वै: प्राणिन: पान्ति साधव: क्षणभङ्गुरै: ।
बद्धवैरेषु भूतेषु मोहितेष्वात्ममायया ॥ ३९ ॥
 
 
अनुवाद
सामान्य लोग, भगवान की माया के मोह में फँसे होने के कारण, हमेशा एक-दूसरे के प्रति द्वेष में लगे रहते हैं। लेकिन भक्तगण, अपने नश्वर शरीर को भी खतरे में डालकर, उनकी रक्षा का प्रयास करते हैं।
 
Ordinary people, bewildered by the illusory power of the Lord, are always engaged in enmity toward one another. But devotees try to protect their mortal bodies even by putting them in danger.
तात्पर्य
यह वैष्णवों की विशेषता होती है। पर-दुःख-दुःखी: एक वैष्णव को जीवों की अशांत स्थिति देखकर बड़ा दुःख होता है, अन्यथा वह उन्हें सुखी बनने का उपदेश ही क्यों देगा? भौतिक जीवन में तो क्रिया-प्रतिक्रिया के अनुसार शत्रुता अवश्य होती है, अतएव भौतिक जीवन की तुलना सँसार-दावानल से की गई है, जो अनायास ही ज्वलित हो उठता है। भगवान शिव तथा उनकी परम्परा के अनुयायी मनुष्य को इस भौतिक जीवन के खतरनाक दावानल से बचाने का प्रयत्न करते हैं। यह भगवान शिव के सिद्धांतों पर चलनेवाले तथा रुद्र सम्प्रदाय के भक्तों का परम कर्त्तव्य होता है। वैष्णव सम्प्रदाय चार हैं और रुद्र सम्प्रदाय इनमें से एक है क्योंकि भगवान शिव (रुद्र) वैष्णवों में श्रेष्ठ हैं (वैष्णवानां यथा शम्भुः)। भगवान शिव ने तो मानवता के हितार्थ समस्त विषपान भी किया था, जैसा कि हम देखेंगे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)