एतत् परं प्रपश्यामो न परं ते महेश्वर ।
मृडनाय हि लोकस्य व्यक्तिस्तेऽव्यक्तकर्मण: ॥ ३५ ॥
अनुवाद
हे महान शासक! आपका असली स्वरूप हमारे लिए जानना नामुमकिन है। जितना हम देख पाते हैं, आपकी उपस्थिति हर किसी के लिए खुशहाली और समृद्धि लेकर आती है। इससे परे, आपके कार्यों को कोई नहीं समझ सकता। हम सिर्फ़ इतना ही देख सकते हैं, इससे ज्यादा कुछ भी नहीं।
O great ruler! It is impossible for us to understand your true nature. As far as we can see, your presence brings happiness and prosperity to everyone. Beyond this, no one can understand your activities. This is all we can see, nothing more.
तात्पर्य
जब देवताओं ने भगवान शिव को ये प्रार्थनाएँ अर्पित कीं, तब उनका आंतरिक उद्देश्य उन्हें प्रसन्न करना था ताकि वह हलाहल विष द्वारा बनाई गयी परेशान करने वाली स्थिति को ठीक करें। जैसे कि भगवद्-गीता में कहा गया है (7.20) कामाइस तैस तेर हृता ज्ञानाह प्रपद्यन्ते अन्या-देवताह: जब कोई देवताओं की उपासना करता है, तो यह निश्चित रूप से गहरी जड़ वाली इच्छाओं के कारण ही होता है जिन्हें वह उन देवताओं की कृपा से पूरा करना चाहता है। सामान्य तौर पर लोग किसी उद्देश्य से देवताओं की उपासना से जुड़े होते हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥