svādhyāya-śruta-sampannāḥ prakhyātā janma-karmabhiḥ शब्दों के संबंध में, एक और प्रश्न उठाया जा सकता है। यदि कोई वास्तव में वैदिक ज्ञान में शिक्षित है, निर्धारित कार्यों को करने के लिए प्रसिद्ध है और एक महान कुलीन परिवार में जन्म लिया है, तो उसे राक्षस क्यों कहा जाना चाहिए? उत्तर यह है कि कोई बहुत अधिक शिक्षित हो सकता है और एक कुलीन परिवार में पैदा हुआ हो सकता है, लेकिन यदि वह ईश्वरविहीन है, यदि वह भगवान के निर्देशों को नहीं सुनता है, तो वह राक्षस है। इतिहास में हिरण्यकशिपु, रावण और कंस जैसे पुरुषों के कई उदाहरण हैं जो अच्छी तरह से शिक्षित थे, जो कुलीन परिवारों में पैदा हुए थे और जो युद्ध में बहुत शक्तिशाली और वीर थे, लेकिन जो भगवान का उपहास करने के कारण राक्षस या राक्षस कहलाते थे। कोई बहुत अच्छी तरह से शिक्षित हो सकता है, लेकिन यदि उसे कृष्ण चेतना की कोई समझ नहीं है, सर्वोच्च प्रभु के प्रति कोई आज्ञाकारिता नहीं है, तो वह राक्षस है। उसका वर्णन स्वयं भगवान ने भगवद्-गीता (7.15) में किया है:
na māṁ duṣkṛtino mūḍhāḥ
prapadyante narādhamāḥ
māyayāpahṛta-jñānā
āsuraṁ bhāvam āśritāḥ
"वे दुष्टात्मा जो घोर मूर्ख हैं, मानव जाति में सबसे नीच हैं, जिनका ज्ञान माया द्वारा चुरा लिया गया है, और जो राक्षसों की नास्तिक प्रकृति में भाग लेते हैं, वे मेरे शरण में नहीं आते हैं।" आसुराम भावां से तात्पर्य ईश्वर के अस्तित्व या भगवान के पारलौकिक निर्देशों को स्वीकार न करना है। भगवद्-गीता में स्पष्ट रूप से भगवान द्वारा सीधे दिए गए पारलौकिक निर्देश हैं। लेकिन असुर, इन निर्देशों को सीधे स्वीकार करने के बजाय, अपने स्वयं के सनकी तरीकों के अनुसार टिप्पणियाँ करते हैं और सभी को गुमराह करते हैं, अपने लिए भी लाभ के बिना। इसलिए व्यक्ति को राक्षसी, ईश्वरविहीन व्यक्तियों से बहुत सावधान रहना चाहिए। भगवान कृष्ण के अनुसार, भले ही एक ईश्वरविहीन राक्षस बहुत अच्छी तरह से शिक्षित हो, उसे मूढ़, नरधम और मायापहृत ज्ञान माना जाना चाहिए।
