श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 7: शिवजी द्वारा विषपान से ब्रह्माण्ड की रक्षा  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  8.7.3 
तन्नैच्छन् दैत्यपतयो महापुरुषचेष्टितम् ।
न गृह्णीमो वयं पुच्छमहेरङ्गममङ्गलम् ।
स्वाध्यायश्रुतसम्पन्ना: प्रख्याता जन्मकर्मभि: ॥ ३ ॥
 
 
अनुवाद
दैत्यों के नेताओं ने पूँछ को पकड़ना उचित नहीं समझा क्योंकि यह सर्प का अशुभ अंग है। इसके बजाय, वे उस अगले हिस्से को पकड़ना चाहते थे जिसे भगवान और देवताओं ने पकड़ रखा था क्योंकि वह भाग शुभ और महिमामय था। इसलिए, दैत्यों ने इस तर्क के साथ कि वे सभी वैदिक ज्ञान में अत्यधिक प्रवीण हैं और अपने जन्म और कार्यों के लिए प्रसिद्ध हैं, विरोध किया कि वे सर्प के अगले हिस्से को पकड़ना चाहते हैं।
 
The leaders of the demons thought it foolish to take hold of the tail because it is an inauspicious part of the serpent. Instead, they wanted to take hold of the front part which was held by the Lord and the demigods because it was auspicious and glorious. Thus the Asuras objected to taking hold of the front part of the serpent, arguing that they were all highly advanced in Vedic knowledge and renowned for their birth and activities.
तात्पर्य
राक्षसों ने सोचा कि नाग का सिर अनुकूल है और उसके उस हिस्से को पकड़ना अधिक वीरतापूर्ण होगा। इसके अलावा, दैत्यों को हमेशा देवताओं के विपरीत कार्य करना चाहिए। यही उनका स्वभाव है। हमने वास्तव में यह हमारे कृष्ण चेतना आंदोलन के संदर्भ में देखा है। हम गाय की सुरक्षा की वकालत कर रहे हैं और लोगों को अधिक दूध पीने और दूध से बने स्वादिष्ट व्यंजन खाने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं, लेकिन राक्षस, केवल ऐसे प्रस्तावों का विरोध करने के लिए, यह दावा कर रहे हैं कि वे वैज्ञानिक ज्ञान में उन्नत हैं, जैसा कि यहाँ शब्दों svādhyāya-śruta-sampannāḥ द्वारा वर्णित है। वे कहते हैं कि अपने वैज्ञानिक तरीके के अनुसार, उन्होंने पाया है कि दूध खतरनाक है और गायों को मारकर प्राप्त गोमांस बहुत पौष्टिक होता है। मतभेद हमेशा बना रहेगा। वास्तव में, यह प्राचीन काल से अस्तित्व में है। लाखों साल पहले भी यही प्रतियोगिता थी। दैत्यों ने अपने तथाकथित वैदिक अध्ययन के परिणामस्वरूप, नाग के सिर के पास की तरफ पकड़ना पसंद किया। भगवान को यह समझदारी भरा लगा कि वे नाग के खतरनाक हिस्से को पकड़ें और राक्षसों को पूंछ पकड़ने दें, जो खतरनाक नहीं थी, लेकिन प्रतिस्पर्धी इच्छा के कारण, राक्षसों ने यह समझदारी भरा सोचा कि वे नाग को सिर के पास पकड़ें। यदि देवता जहर पीने जा रहे थे, तो राक्षस यह निश्चय करते थे, "हम क्यों न जहर बाँटें और उसे पीकर गौरवशाली रूप से मर जाएँ?"

svādhyāya-śruta-sampannāḥ prakhyātā janma-karmabhiḥ शब्दों के संबंध में, एक और प्रश्न उठाया जा सकता है। यदि कोई वास्तव में वैदिक ज्ञान में शिक्षित है, निर्धारित कार्यों को करने के लिए प्रसिद्ध है और एक महान कुलीन परिवार में जन्म लिया है, तो उसे राक्षस क्यों कहा जाना चाहिए? उत्तर यह है कि कोई बहुत अधिक शिक्षित हो सकता है और एक कुलीन परिवार में पैदा हुआ हो सकता है, लेकिन यदि वह ईश्वरविहीन है, यदि वह भगवान के निर्देशों को नहीं सुनता है, तो वह राक्षस है। इतिहास में हिरण्यकशिपु, रावण और कंस जैसे पुरुषों के कई उदाहरण हैं जो अच्छी तरह से शिक्षित थे, जो कुलीन परिवारों में पैदा हुए थे और जो युद्ध में बहुत शक्तिशाली और वीर थे, लेकिन जो भगवान का उपहास करने के कारण राक्षस या राक्षस कहलाते थे। कोई बहुत अच्छी तरह से शिक्षित हो सकता है, लेकिन यदि उसे कृष्ण चेतना की कोई समझ नहीं है, सर्वोच्च प्रभु के प्रति कोई आज्ञाकारिता नहीं है, तो वह राक्षस है। उसका वर्णन स्वयं भगवान ने भगवद्-गीता (7.15) में किया है:

na māṁ duṣkṛtino mūḍhāḥ

prapadyante narādhamāḥ

māyayāpahṛta-jñānā

āsuraṁ bhāvam āśritāḥ

"वे दुष्टात्मा जो घोर मूर्ख हैं, मानव जाति में सबसे नीच हैं, जिनका ज्ञान माया द्वारा चुरा लिया गया है, और जो राक्षसों की नास्तिक प्रकृति में भाग लेते हैं, वे मेरे शरण में नहीं आते हैं।" आसुराम भावां से तात्पर्य ईश्वर के अस्तित्व या भगवान के पारलौकिक निर्देशों को स्वीकार न करना है। भगवद्-गीता में स्पष्ट रूप से भगवान द्वारा सीधे दिए गए पारलौकिक निर्देश हैं। लेकिन असुर, इन निर्देशों को सीधे स्वीकार करने के बजाय, अपने स्वयं के सनकी तरीकों के अनुसार टिप्पणियाँ करते हैं और सभी को गुमराह करते हैं, अपने लिए भी लाभ के बिना। इसलिए व्यक्ति को राक्षसी, ईश्वरविहीन व्यक्तियों से बहुत सावधान रहना चाहिए। भगवान कृष्ण के अनुसार, भले ही एक ईश्वरविहीन राक्षस बहुत अच्छी तरह से शिक्षित हो, उसे मूढ़, नरधम और मायापहृत ज्ञान माना जाना चाहिए।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)