श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 7: शिवजी द्वारा विषपान से ब्रह्माण्ड की रक्षा  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  8.7.28 
कुक्षि: समुद्रा गिरयोऽस्थिसङ्घा
रोमाणि सर्वौषधिवीरुधस्ते ।
छन्दांसि साक्षात् तव सप्त धातव-
स्त्रयीमयात्मन् हृदयं सर्वधर्म: ॥ २८ ॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु, आप त्रिवेदी हो, तीनों वेदों की आप साक्षात मूर्ति हो। सात समुद्र आपका उदर है और पर्वत आपकी हड्डियाँ हैं। सभी औषधियाँ, लताएँ और वनस्पतियाँ आपके शरीर के रोएँ हैं। गायत्री जैसे वैदिक मंत्र आपके शरीर के सात आवरण हैं, और वैदिक धर्म पद्धति आपके हृदय कोर है।
 
हे प्रभु, आप त्रिवेदी हो, तीनों वेदों की आप साक्षात मूर्ति हो। सात समुद्र आपका उदर है और पर्वत आपकी हड्डियाँ हैं। सभी औषधियाँ, लताएँ और वनस्पतियाँ आपके शरीर के रोएँ हैं। गायत्री जैसे वैदिक मंत्र आपके शरीर के सात आवरण हैं, और वैदिक धर्म पद्धति आपके हृदय कोर है।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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