श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 7: शिवजी द्वारा विषपान से ब्रह्माण्ड की रक्षा  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  8.7.26 
अग्निर्मुखं तेऽखिलदेवतात्मा
क्षितिं विदुर्लोकभवाङ्‍‍घ्रिपङ्कजम् ।
कालं गतिं तेऽखिलदेवतात्मनो
दिशश्च कर्णौ रसनं जलेशम् ॥ २६ ॥
 
 
अनुवाद
हे समस्त लोकों के पिता! विद्वानों को यह ज्ञात है कि अग्नि आपका मुख है, पृथ्वी का विस्तार आपके चरणकमल हैं, निखिल देवरूप आप ही हैं, नित्य काल आपकी गति है, चारों दिशाएँ आपके कान हैं और जल के स्वामी वरुण आपकी जीभ हैं।
 
हे समस्त लोकों के पिता! विद्वानों को यह ज्ञात है कि अग्नि आपका मुख है, पृथ्वी का विस्तार आपके चरणकमल हैं, निखिल देवरूप आप ही हैं, नित्य काल आपकी गति है, चारों दिशाएँ आपके कान हैं और जल के स्वामी वरुण आपकी जीभ हैं।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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