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श्लोक 8.7.10  |
सुरासुरेन्द्रैर्भुजवीर्यवेपितं
परिभ्रमन्तं गिरिमङ्ग पृष्ठत: ।
बिभ्रत् तदावर्तनमादिकच्छपो
मेनेऽङ्गकण्डूयनमप्रमेय: ॥ १० ॥ |
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| अनुवाद |
| हे राजा! जब देवता व असुरों ने अपनी बाहों के बल से अनोखे कछुवे की पीठ पर रखे हुए मंदराचल पर्वत को घुमाया, तब कछुवे ने पर्वत के इस घूमने को अपनी खुजली दूर करने का तरीका समझ लिया, और उसे इससे बहुत आनंद आया। |
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| हे राजा! जब देवता व असुरों ने अपनी बाहों के बल से अनोखे कछुवे की पीठ पर रखे हुए मंदराचल पर्वत को घुमाया, तब कछुवे ने पर्वत के इस घूमने को अपनी खुजली दूर करने का तरीका समझ लिया, और उसे इससे बहुत आनंद आया। |
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