श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 6: देवताओं तथा असुरों द्वारा सन्धि की घोषणा  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  8.6.9 
रूपं तवैतत् पुरुषर्षभेज्यं
श्रेयोऽर्थिभिर्वैदिकतान्त्रिकेण ।
योगेन धात: सह नस्त्रिलोकान्
पश्याम्यमुष्मिन्नु ह विश्वमूर्तौ ॥ ९ ॥
 
 
अनुवाद
हे श्रेष्ठ व्यक्ति, हे सर्वोच्च नेता! जो लोग वास्तव में परम सौभाग्य की इच्छा करते हैं, वे वैदिक तंत्रों के अनुसार आपके इसी स्वरूप की आराधना करते हैं। हे प्रभु! हम आप में तीनों लोकों को देख सकते हैं।
 
O best of men, O supreme controller! Those who truly desire supreme good fortune worship this form of Yours according to the Vedic tantras. O Lord! We can see the three worlds in You.
तात्पर्य
वैदिक मंत्र कहते हैं: यस्मिन् विज्ञाते सर्वमेवं विज्ञातं भवति (मुंडक उपनिषद 1.3)। जब उपासक ध्यान के द्वारा भगवान सर्वोच्च व्यक्तित्व को देखता है या जब वह भगवान को व्यक्तिगत रूप से आमने-सामने देखता है, तो वह इस ब्रह्माण्ड के भीतर की हर चीज के बारे में जागरूक हो जाता है। वास्तव में, उसे कुछ भी अज्ञात नहीं रहता है। भौतिक संसार के भीतर सब कुछ एक उपासक के लिए पूरी तरह से प्रकट होता है जिसने भगवान सर्वोच्च व्यक्तित्व को देखा है। इसलिए भगवद्-गीता (4.34) उपदेश देती है:

तद् विद्धि प्रणिपातेन

परिप्रश्नेन सेवया

उपदेक्ष्यंति ते ज्ञानं

ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः

"एक आध्यात्मिक गुरु से संपर्क करके ही सत्य सीखने का प्रयास करें। उससे विनम्रतापूर्वक पूछताछ करें और उसकी सेवा करें। आत्म-साक्षात्कारी आत्मा आपको ज्ञान प्रदान कर सकता है क्योंकि उसने सत्य को देखा है।" भगवान ब्रह्मा इन आत्म-साक्षात्कारी अधिकारियों में से एक हैं (स्वयंभूर नारदः शंभूः कुमारो कपिलो मनुः)। इसलिए व्यक्ति को भगवान ब्रह्मा से शिष्य परंपरा को स्वीकार करना चाहिए, और तभी वह भगवान सर्वोच्च व्यक्तित्व को पूर्णता में समझ सकता है। यहाँ विश्व-मूर्ती शब्द इंगित करता है कि सब कुछ भगवान सर्वोच्च व्यक्तित्व के रूप में मौजूद है। जो व्यक्ति उनकी पूजा करने में सक्षम है वह उनमें सब कुछ देख सकता है और उन्हें हर चीज में देख सकता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)