श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 6: देवताओं तथा असुरों द्वारा सन्धि की घोषणा  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  8.6.8 
श्रीब्रह्मोवाच
अजातजन्मस्थितिसंयमाया-
गुणाय निर्वाणसुखार्णवाय ।
अणोरणिम्नेऽपरिगण्यधाम्ने
महानुभावाय नमो नमस्ते ॥ ८ ॥
 
 
अनुवाद
ब्रह्माजी ने कहा: आप भले ही अजन्मा हैं, फिर भी अवतार के रूप में आपकी उपस्थिति और विलुप्ति लगातार चलती रहती है। आप हमेशा भौतिक गुणों से अलग रहते हैं, और समुद्र के समान दिव्य आशीष के आश्रय हैं। अपने दिव्य रूप में हमेशा रहते हुए आप सबसे सूक्ष्म से भी सूक्ष्म हैं। इसलिए हम आपको, जिसका अस्तित्व अनजाना है, सम्मानपूर्वक प्रणाम करते हैं।
 
Brahma said: Although you are unborn, your appearance and disappearance in the form of incarnations are always going on. You are always free from material qualities and are the abode of divine bliss like the ocean. Always residing in your divine form, you are even more subtle than the subtlest. Therefore, we respectfully salute you, whose existence is inconceivable.
तात्पर्य
भगवान श्रीमद्भगवद् गीता (4.6) में कहते हैं:

अजोऽपि सन्नव्ययात्मा

भूतानाम ईश्वरोऽपि सन्

प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय

सम्भवाम्यात्म-मायया

"यद्यपि मैं अजन्मा हूँ, और मेरा पारलौकिक शरीर कभी भी क्षीण नहीं होता है - और यद्यपि मैं सभी प्राणियों का स्वामी हूँ - तो भी मैं अपने मूल पारलौकिक रूप में प्रत्येक सहस्राब्दी में प्रकट होता हूँ।" भगवद् गीता (4.7) में निम्नलिखित श्लोक में, भगवान कहते हैं:

यदा यदा हि धर्मस्य

ग्‍ला‍निर भवति भारत

अभ्युत्थानम धर्मस्य

तदात्मानं सृजाम्‍य अहम्

"जब भी और जहाँ भी धार्मिक प्रथा में गिरावट आती है, हे भरत के वंशज, और अधर्म का प्रमुख उदय होता है - उस समय मैं स्वयं अवतरित होता हूँ।" इस प्रकार, यद्यपि सर्वोच्च भगवान अजन्मे हैं, लेकिन भगवान कृष्ण और भगवान राम जैसे अवतारों के रूप में विभिन्न रूपों में उनके प्रकट होने का कोई अंत नहीं है। चूँकि उनके अवतार शाश्वत हैं, इसलिए इन अवतारों द्वारा किए गए विभिन्न कार्य भी शाश्वत हैं। परमेश्‍वर का सर्वोच्च व्यक्तित्‍व प्रकट नहीं होते क्योंकि उन्हें कर्म द्वारा ऐसा करने के लिए बाध्य किया जाता है जैसे साधारण जीव जिनको एक निश्चित प्रकार का शरीर स्वीकार करने के लिए बाध्य किया जाता है। यह समझा जाना चाहिए कि भगवान का शरीर और कार्य सभी पारलौकिक हैं, प्रकृति के भौतिक तरीकों के संदूषण से मुक्त हैं। ये लीलाएँ भगवान के लिए पारलौकिक आनंद हैं। अपरिगण्य-धामने शब्द बहुत महत्वपूर्ण है। भगवान के विभिन्न अवतारों में प्रकट होने की कोई सीमा नहीं है। ये सभी अवतार शाश्वत, आनंदमय और ज्ञान से परिपूर्ण हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)