तत्पश्चात, पक्षियों के राजा गरुड़ ने अपने कंधों से मंदरा पर्वत को उतारा और उसे जल के निकट ले गए। उसके बाद भगवान ने उसे उस स्थान से चले जाने को कहा और वह चला गया।
Thereafter the bird king Garuda took down the Mandara mountain from his shoulder and took it near the water. Then the Lord asked him to leave that place and he left.
तात्पर्य
भुगवान ने गरुड़ से उस स्थान को छोड़ने को कहा क्यों कि सर्प वासुकि जो मन्थन के लिये रस्सी के रूप में प्रयोग किया जाना था, गरुड़ की मौजूदगी में वहां नहीं आ सकता था। भगवान विष्णु के वाहक गरुड़ शाकाहारी नहीं हैं। वे बड़े सर्प खाते हैं। वासुकि एक महान सर्प होने के कारण, पक्षियों के सरदार गरुड़ के लिए स्वाभाविक आहार साबित होते। इसलिए भगवान विष्णु ने गरुड़ को चले जाने को कहा ताकि वासुकि को लाकर मंदरा पर्वत के साथ समुद्र मंथन के लिये प्रयुक्त किया जाए, जिसे मंथन के दंड के रूप में प्रयोग किया जाना था। ये भगवान के अद्भुत प्रबंध हैं। कुछ भी संयोग से नहीं होता। किसी पक्षी की पीठ पर मंदरा पर्वत को रखना और फिर उसे सही जगह पर स्थापित करना किसी के लिए भी कठिन हो सकता है चाहे वह देवता हो या राक्षस, लेकिन भगवान के लिए सब कुछ संभव है जैसा कि इस लीला द्वारा दिखाया गया है। भगवान को एक हाथ से पर्वत उठाने में कोई कठिनाई नहीं हुई और भगवान की कृपा से उनके वाहक गरुड़ ने सभी राक्षसों और देवताओं को एक साथ ही उठाकर ले गये। भगवान को योगेश्वर, सभी रहस्यमय शक्तियों के स्वामी के रूप में उनकी सर्वव्यापक शक्ति के कारण जाना जाता हैं। यदि वे चाहें तो वे किसी भी वस्तु को कपास से भी हल्का या ब्रह्मांड से भी भारी बना सकते हैं। वे जो भगवान की गतिविधियों पर विश्वास नहीं करते, वे यह नहीं समझा सकते हैं कि चीजें कैसे घटित होती हैं। "संयोग" जैसे शब्दों का प्रयोग करते हुए, वे अविश्वसनीय विचारों में आश्रय लेते हैं। कुछ भी संयोगवश नहीं होता है। सब कुछ भगवान द्वारा किया जाता है जैसा कि भगवान ने स्वयं भगवद गीता (9.10) में कहा है। मायाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सच्चरचरम। ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति के भीतर जो भी क्रिया और प्रतिक्रिया होती हैं वे सभी भगवान के अधीक्षण में होती हैं। यद्यपि, चूँकि राक्षस भगवान की शक्ति को समझ नहीं पाते, जब अद्भुद चीजें घटित होती हैं, राक्षस सोचते हैं कि वे संयोगवश हुई हैं।
इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध आठ के अंतर्गत छठा अध्याय समाप्त होता है ।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥