फिर भगवान ने बहुत ही आसानी से एक हाथ से पर्वत को उठाकर गरुड़ की पीठ पर रख दिया। फिर वो खुद गरुड़ पर सवार हुए और देवताओं तथा असुरों से घिरे हुए क्षीरसागर चले गए।
Then the Lord lifted the mountain with one hand very easily and placed it on the back of Garuda. Then He Himself rode on Garuda and went to Kshirsagar surrounded by the Gods and Demons.
तात्पर्य
यहाँ परम पुरुषोत्तम भगवान् की सर्वोपरिता की प्रमाणिती है, जो सभी से ऊपर है। जीवों के दो वर्ग हैं - दैत्य और देवता - और परम पुरुषोत्तम भगवान् दोनों से ऊपर हैं। दैत्य सृष्टि के "संयोग" के सिद्धांत पर विश्वास करते हैं, जबकि देवता परम पुरुषोत्तम भगवान के हाथ से सृष्टि में विश्वास करते हैं। सर्वोच्च प्रभु की सर्वव्यापकता यहाँ सिद्ध की जाती है, क्योंकि केवल एक हाथ से उन्होंने मंदार पर्वत, देवताओं और दैत्यों को उठाकर गरुड़ की पीठ पर रखा और उन्हें क्षीर सागर में ले आए। अब, भक्त तुरंत इस घटना को स्वीकार कर लेंगे, यह जानते हुए कि भगवान कुछ भी उठा सकते हैं, चाहे वह कितना भी भारी क्यों न हो। लेकिन यद्यपि दैत्यों को भी देवताओं के साथ ले जाया गया था, दैत्यों ने इस घटना सुनने के बाद कहा होगा कि यह पौराणिक है। लेकिन अगर भगवान सर्वशक्तिमान हैं, तो उनके लिए पहाड़ उठाना क्यों मुश्किल होगा? चूँकि वह असंख्य ग्रहों को कई सैकड़ों और हजारों मंदार पर्वतों के साथ तैरा रहे हैं, तो उनमें से एक को अपने हाथ से क्यों नहीं उठा सकते? यह पौराणिक नहीं है, लेकिन विश्वासियों और श्रद्धाहीनों के बीच अंतर यह है कि भक्त वैदिक साहित्य में वर्णित घटनाओं को सत्य मानते हैं, जबकि दैत्य केवल बहस करते हैं और इन सभी ऐतिहासिक घटनाओं को पौराणिक कहते हैं। दैत्य यह समझाना पसंद करेंगे कि ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति में होने वाली हर चीज संयोग से होती है, लेकिन देवता या भक्त कभी भी किसी चीज को संयोग नहीं मानते हैं। बल्कि, वे जानते हैं कि सब कुछ परम पुरुषोत्तम भगवान् की व्यवस्था है। यही देवताओं और दैत्यों के बीच का अंतर है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥