श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 6: देवताओं तथा असुरों द्वारा सन्धि की घोषणा  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  8.6.32 
ततो देवासुरा: कृत्वा संविदं कृतसौहृदा: ।
उद्यमं परमं चक्रुरमृतार्थे परन्तप ॥ ३२ ॥
 
 
अनुवाद
हे शत्रुदमनकारी महाराज परीक्षित! तदनंतर देवताओं एवं दानवों के मध्य समझौता हो गया और इन्होंने भगवान इन्द्र के द्वारा सुझाए गए अमृत उत्पादन की योजना को बड़े परिश्रम से क्रियान्वित करने की व्यवस्था की।
 
O Maharaja Pariksit, chastiser of enemies, the gods and the demons then entered into an agreement and made arrangements to put into action with great intrepidity the plan proposed by Indra for producing nectar.
तात्पर्य
इस पद्य में संविदम शब्द महत्वपूर्ण है। देवताओं और राक्षसों दोनों ने युद्ध रोकने के लिए कम से कम कुछ समय के लिए सहमति दी थी और अमृत उत्पादन में लग गए थे। इस संदर्भ में श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर लिखते हैं:

संविद युद्धे प्रतिज्ञायाम

आचारे नामनि तोषणे

संभाषणे क्रियाकारे

संकेत-ज्ञानयोः अपि

संविद शब्द का प्रयोग अलग-अलग अर्थो में किया जाता है जैसे, "युद्ध में," "प्रतिज्ञा में," "संतुष्टि के लिए," "संबोधन में," "व्यवहारिक कार्य में," "संकेत में," और "ज्ञान में।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)