श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 6: देवताओं तथा असुरों द्वारा सन्धि की घोषणा  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  8.6.15 
अहं गिरित्रश्च सुरादयो ये
दक्षादयोऽग्नेरिव केतवस्ते ।
किं वा विदामेश पृथग्विभाता
विधत्स्व शं नो द्विजदेवमन्त्रम् ॥ १५ ॥
 
 
अनुवाद
मैं (ब्रह्मा), शिव और सारे देवताओं के साथ-साथ, दक्ष जैसे प्रजापति संपूर्ण चराचर के मूल अग्नि स्वरूप आपके द्वारा प्रकाशित चिनगारियाँ मात्र हैं। चूँकि हम आपके छोटे से कण हैं अतएव हम अपनी कुशलता के विषय में समझ ही क्या सकते हैं? हे परमेश्वर! हमें मोक्ष का वह साधन प्रदान करें जो ब्राह्मणों और देवताओं के लिए उपयुक्त हो।
 
I (Brahma), Lord Shiva and all the demigods, along with Prajapatis like Daksha are only sparks, which are lit by you, who are the original fire. Since we are your particles, what can we understand about our own well-being? O Supreme Lord! Provide us with the means of salvation which is suitable for brahmanas and demigods.
तात्पर्य
इस श्लोक में, द्विज-देव-मंत्रम शब्द बहुत महत्वपूर्ण है। मंत्र शब्द का अर्थ है "वह जो व्यक्ति को भौतिक संसार से मुक्त करता है।" केवल द्विज (ब्राह्मण) और देव (देवता) ही भगवान के निर्देशों से भौतिक अस्तित्व से मुक्ति पा सकते हैं। भगवान द्वारा बोले गए प्रत्येक शब्द एक मंत्र है और सशर्त आत्माओं को मानसिक अटकलों से मुक्त करने के लिए उपयुक्त है। सशर्त आत्माएं अस्तित्व के लिए संघर्ष में लिप्त हैं (मनः षष्ठानींद्रियाणि प्रकृति-स्थानि करषति)। इस संघर्ष से मुक्ति उच्चतम लाभ है, लेकिन जब तक भगवान से मंत्र नहीं मिलता तब तक मुक्ति असंभव है। प्रारंभिक मंत्र गायत्री मंत्र है। इसलिए, शुद्धि के बाद, जब कोई ब्राह्मण (द्विज) बनने के योग्य होता है, तो उसे गायत्री मंत्र दिया जाता है। केवल गायत्री मंत्र का जाप करने से ही व्यक्ति मुक्त हो सकता है। हालाँकि, यह मंत्र केवल ब्राह्मणों और देवताओं के लिए उपयुक्त है। कलियुग में, हम सभी बहुत कठिन स्थिति में हैं, जिसमें हमें एक उपयुक्त मंत्र की आवश्यकता है जो हमें इस युग के खतरों से मुक्त कर सके। इसलिए भगवान, भगवान चैतन्य के अवतार के रूप में हमें हरे कृष्ण मंत्र देते हैं।

हरिः नाम हरिः नाम

हरिः नामैव केवलम

कलौ नास्त्येव नास्त्येव

नास्त्येव गतिरन्यथा

"झगड़े और पाखंड के इस युग में, मुक्ति का एकमात्र साधन भगवान के पवित्र नाम का जाप करना है। कोई दूसरा रास्ता नहीं है। कोई दूसरा रास्ता नहीं है। कोई दूसरा रास्ता नहीं है।" अपने शिक्शाष्टक में, भगवान चैतन्य कहते हैं, परम विजायते श्री-कृष्ण-संकीर्तनम: "श्री-कृष्ण-संकीर्तन के जाप की सभी महिमा!" महा-मंत्र - हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे/ हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे - स्वयं भगवान द्वारा सीधे उच्चारित किया जाता है, जो हमें मुक्ति के लिए यह मंत्र देते हैं।

हम भौतिक अस्तित्व के खतरों से मुक्त होने का कोई भी साधन नहीं बना सकते। यहाँ, यहाँ तक कि देवताओं, जैसे भगवान ब्रह्मा और भगवान शिव, और प्रजापति, जैसे दक्ष, को सर्वोच्च भगवान की उपस्थिति में प्रकाशमान चिंगारियों के रूप में कहा जाता है, जिनकी तुलना एक महान अग्नि से की जाती है। चिंगारियाँ तब तक सुंदर होती हैं जब तक वे आग में होती हैं। इसी तरह, हमें भगवान के साथ रहना होगा और हमेशा भक्ति में संलग्न रहना होगा, क्योंकि तभी हम हमेशा शानदार और प्रकाशमान रहेंगे। भगवान की सेवा से जैसे ही हम गिरते हैं, हमारी प्रतिभा और रोशनी तुरंत बुझ जाएगी, या कम से कम कुछ समय के लिए रुक जाएगी। जब हम जीवित प्राणी, जो मूल अग्नि की चिंगारियों की तरह हैं, सर्वोच्च भगवान, एक भौतिक स्थिति में गिर जाते हैं, तो हमें सर्वोच्च भगवान से मंत्र लेना चाहिए जैसा कि श्री चैतन्य महाप्रभु ने दिया है। इस हरे कृष्ण मंत्र का जाप करने से, हम इस भौतिक संसार की सभी कठिनाइयों से मुक्त हो जाएंगे।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)