जैसे वन अग्नि से पीडित हाथी गंगाजल पाकर अत्यंत प्रसन्न होते हैं, उसी प्रकार हे कमलनाभ प्रभु! आप हमारे सामने प्रकट हुए हैं, इसलिए हम परमानंद का अनुभव कर रहे हैं। हम लंबे समय से आपके दर्शन की अभिलाषा कर रहे थे और अब आपका दर्शन पाकर हमने जीवन का परम लक्ष्य प्राप्त कर लिया है।
Elephants suffering from forest fires are very happy on receiving Ganga water. Similarly, O Lord! Kamalnabh Prabhu! Since you have appeared before us now, we are experiencing divine happiness. We had been longing to see you for a long time, so by seeing you, we have achieved the ultimate goal of our life.
तात्पर्य
भगवान के भक्त हमेशा परमेश्वर को आमने-सामने देखने के लिए बहुत उत्सुक रहते हैं, लेकिन वे यह मांग नहीं करते कि भगवान उनके सामने आए, क्योंकि एक शुद्ध भक्त ऐसी मांग को भक्ति सेवा के विरुद्ध मानता है। श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने शिक्षाष्टक में यह सबक सिखाया है। अदर्शनन मर्म-हताम्करोतु वा। भक्त हमेशा प्रभु को आमने-सामने देखने के लिए उत्सुक रहता है, लेकिन अगर वह दुखी है क्योंकि वह भगवान को नहीं देख सकता, यहां तक कि जीवन के बाद भी, वह कभी भी भगवान को प्रकट होने की आज्ञा नहीं देगा। यह शुद्ध भक्ति का प्रतीक है। इसलिए इस श्लोक में हम अति-चिर-इप्सित-अर्थ शब्द पाते हैं, जिसका अर्थ है कि भक्त भगवान को देखने के लिए बहुत लंबे समय से आकांक्षा रखता है। यदि भगवान, अपनी स्वयं की प्रसन्नता से, भक्त के सामने प्रकट होते हैं, तो भक्त अत्यंत खुश महसूस करता है, जैसा कि ध्रुव महाराज ने महसूस किया था जब उन्होंने भगवान को व्यक्तिगत रूप से देखा था। जब ध्रुव महाराज ने भगवान को देखा, तो उन्हें भगवान से किसी वरदान की इच्छा नहीं थी। दरअसल, केवल भगवान को देखकर, ध्रुव महाराज इतने संतुष्ट महसूस कर रहे थे कि वह भगवान से किसी वरदान की कामना नहीं करना चाहते थे (स्वामी कृतार्थः अस्मि वरं न याचे) । एक शुद्ध भक्त, चाहे भगवान को देखने में सक्षम हो या नहीं, हमेशा प्रभु की भक्ति सेवा में लगा रहता है, हमेशा यह आशा करता है कि किसी समय प्रभु उससे प्रसन्न होकर उसके सामने प्रकट हो सकते हैं ताकि वह भगवान को आमने-सामने देख सके।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥