इस युग के लोग आरामदायक जीवन के लिए औद्योगिक उपक्रमों की ओर प्रवृत्त हैं, लेकिन वे भक्ति सेवा करने से इनकार करते हैं, जिससे वे भगवान के पास वापस लौटकर जीवन के परम लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं। दुर्भाग्य से, जैसा कि कहा जाता है, ना ते विदुः स्वार्थ-गतिं हि विष्णुं दुराशया ये बाहिर-अर्थ-मानिनः। आध्यात्मिक शिक्षा के बिना लोगों को यह पता नहीं होता है कि जीवन का परम लक्ष्य भगवान के पास घर वापस जाना है। जीवन के इस लक्ष्य को भूलकर, वे निराशा और कुंठा (मोघाशा मोघ-कर्माणो मोघ ज्ञाना विचतसः) में बहुत मेहनत कर रहे हैं। तथाकथित वैश्य - उद्योगपति या व्यवसायी - बड़े-बड़े औद्योगिक उद्यमों में शामिल हैं, लेकिन वे खाद्यान्न और दूध में रुचि नहीं रखते हैं। हालाँकि, जैसा कि यहाँ बताया गया है, रेगिस्तान में भी पानी के लिए खुदाई करके, हम खाद्यान्न का उत्पादन कर सकते हैं; जब हम खाद्यान्न और सब्जियाँ पैदा करते हैं, तो हम गायों को सुरक्षा प्रदान कर सकते हैं; गायों को सुरक्षा देते हुए, हम उनसे प्रचुर मात्रा में दूध प्राप्त कर सकते हैं; और पर्याप्त दूध प्राप्त करके और उसे खाद्यान्न और सब्जियों के साथ मिलाकर, हम सैकड़ों अमृतोपम भोजन तैयार कर सकते हैं। हम इस भोजन को सहर्ष खा सकते हैं और इस तरह औद्योगिक उद्यमों और बेरोजगारी से बच सकते हैं। कृषि और गोरक्षा पाप रहित बनने और इस प्रकार भक्ति सेवा की ओर आकर्षित होने का उपाय है। जो लोग पापी होते हैं वे भक्ति सेवा की ओर आकर्षित नहीं हो सकते। जैसा कि भगवद-गीता (7.28) में कहा गया है:
येषां त्वंता-गतं पापं
जननां पुण्य-कर्मणां
ते द्वंद्व-मोह-निरुक्त
भजंते माम दृढ़-व्रताः
"जो लोग पिछले जन्मों और इस जन्म में पुण्य कर्म कर चुके हैं, जिनके पाप कर्म पूरी तरह से मिट चुके हैं और जो भ्रम के द्वंद्व से मुक्त हैं, वे दृढ़ संकल्प के साथ मेरी सेवा में लगे हुए हैं।" कलियुग के अधिकांश लोग पापी, अल्पायु, दुर्भाग्यशाली और व्यथित (मांडाः सुमंद-मत्यो मंदा-भाग्या ह्य उपद्रुतः) हैं। उनके लिए, चैतन्य महाप्रभु ने सलाह दी है:
हरि नाम हरि नाम
हरि नामैव केवलम
कलौ नास्त्य एव नास्त्य एव
नास्त्य एव गतिर अन्यथा
"झगड़े और पाखंड के इस युग में उद्धार का एकमात्र साधन भगवान का पवित्र नाम का जाप करना है। कोई और रास्ता नहीं है। कोई और रास्ता नहीं है। कोई और रास्ता नहीं है।"
